SSC हाई-टेक नकल गिरोह का भंडाफोड़: देश भर की 500 से ज्यादा कंप्यूटर लैब संदेह के घेरे में, STF जांच तेज

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कर्मचारी चयन आयोग (SSC) द्वारा आयोजित ऑनलाइन परीक्षाओं में नकल और धांधली कराने वाले एक बहुत बड़े अंतर्राज्यीय गिरोह का भंडाफोड़ करते हुए उत्तराखंड स्पेशल टास्क फोर्स (STF) ने कई चौंकाने वाले खुलासे किए हैं. गिरफ्तार किए गए मुख्य आरोपी ईश्वरी प्रसाद ने पूछताछ के दौरान स्वीकार किया है कि इस संगठित नकल माफिया ने उत्तराखंड, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और राजस्थान जैसे कई राज्यों में 500 से अधिक कंप्यूटर लैब का एक विशाल नेटवर्क स्थापित कर रखा है।

यह गिरोह परीक्षा आयोजित कराने वाली मूल कंपनी के कुछ भ्रष्ट कर्मचारियों की मिलीभगत से लैब सेटअप के समय ही कंप्यूटरों में ऐसी तकनीकी सेटिंग्स कर देता था, जिससे पूरी परीक्षा प्रणाली को बाहर बैठे सॉल्वर आसानी से नियंत्रित कर लेते थे. इस गंभीर धोखाधड़ी के सामने आने के बाद पुलिस ने आगामी परीक्षाओं की शुचिता बनाए रखने के लिए तत्काल कार्रवाई करते हुए कई संदिग्ध सेंटरों को सील कर दिया है और मामले की गहराई से जांच कर रही है।

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सर्वर रूम के जरिए की जाती थी शातिराना सेटिंग

इस नकल गिरोह का काम करने का तरीका बेहद हाईटेक और शातिराना था, जो सामान्य सुरक्षा जांच में आसानी से पकड़ में नहीं आता था. आरोपियों ने बताया कि वे केवल कंप्यूटर का रिमोट एक्सेस ही अपने हाथ में नहीं लेते थे, बल्कि परीक्षा केंद्र पर लगे सीसीटीवी कैमरों की लाइव फीड को भी पूरी तरह नियंत्रित करते थे. इसके लिए सीसीटीवी सर्वर की केबल को चालाकी से यूपीएस सर्वर रूम के एक गोपनीय चेंबर से जोड़ दिया जाता था, ताकि जरूरत पड़ने पर या तो सीसीटीवी को पूरी तरह बंद किया जा सके या फिर उसकी फीड में मनचाही गड़बड़ी पैदा की जा सके. इस प्रकार, परीक्षा केंद्र के भीतर बैठा अभ्यर्थी केवल कंप्यूटर स्क्रीन के सामने बैठा रहता था, जबकि उसका प्रश्नपत्र स्क्रीन पर देखकर बाहर बैठा कोई अन्य सॉल्वर सारे सही उत्तर दर्ज कर देता था.

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पद और ग्रेड पे के अनुसार लिया जाता था ठेका

इस गिरोह ने अभ्यर्थियों से मोटी रकम वसूलने के लिए बकायदा एक व्यावसायिक ढांचा तैयार कर रखा था, जहां सरकारी पद के ‘ग्रेड पे’ और मिलने वाली सैलरी के हिसाब से ठेका तय किया जाता था. आम तौर पर चयनित होने वाले अभ्यर्थी को मिलने वाले एक साल के कुल वेतन के बराबर की रकम एडवांस या कमीशन के तौर पर वसूली जाती थी. उदाहरण के लिए, देहरादून में हुए एसएससी मल्टी टास्किंग स्टाफ (MTS) परीक्षा घोटाले में गिरोह ने पांच अभ्यर्थियों को पास कराने का ठेका लिया था, जिसमें अकेले एक मुख्य दलाल को 40 लाख रुपये का लाभ हुआ और उसमें से 13 लाख रुपये से अधिक की राशि सीधे इस तकनीकी सेटिंग को अंजाम देने वाले आरोपियों को बांटी गई थी. एसटीएफ की जांच में यह भी सामने आया है कि यह नेटवर्क दो अलग-अलग टीमों में बंटा हुआ था, जिसमें एक टीम फील्ड में रहकर भौतिक रूप से लैब सेटअप व तकनीकी सेंधमारी करती थी, जबकि दूसरी टीम बाहर से निर्देश और सॉल्वर की व्यवस्था संभालती थी.