सरकार के नशा मुक्त उत्तराखंड की परिकल्पना पर पलीता लगाने की तैयारी, देहरादून में हुक्का बार चलाने के लिए अब नगर निगम देने जा रहा लाइसेंस….

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देहरादून, उत्तराखंड: एक तरफ राज्य सरकार नशा मुक्त उत्तराखंड की परिकल्पना को साकार करने के लिए विभिन्न जागरूकता अभियानों और कानूनों के जरिए नशे के खिलाफ कड़े कदम उठा रही है, वहीं दूसरी ओर देहरादून नगर निगम ने अपने हालिया फैसले से इस मुहिम को लेकर गहरी चिंता खड़ी कर दी है। नगर निगम द्वारा जारी किए गए नए प्रस्ताव में हुक्का बार लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया शुरू करने की बात कही गई है, जिससे शहर में एक बार फिर हुक्का बार कल्चर को बढ़ावा मिल सकता है।

गौरतलब है कि 9 अगस्त 2010 को तत्कालीन सचिव डॉ. उमाकांत पवार द्वारा एक आदेश जारी कर राज्य भर के होटलों, रेस्टोरेंटों व सार्वजनिक स्थलों पर हुक्का सेवन को पूर्णतः प्रतिबंधित कर दिया गया था। यह निर्णय सार्वजनिक स्वास्थ्य के हित में लिया गया था, ताकि युवाओं में बढ़ती नशे की प्रवृत्ति पर नियंत्रण लगाया जा सके। इस आदेश के लागू होने के बाद राज्य के अधिकांश शहरों में हुक्का बार बंद कर दिए गए थे।

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लेकिन अब लगभग 15 वर्षों के बाद देहरादून नगर निगम ने एक नया विवाद खड़ा कर दिया है, जिसके अंतर्गत हुक्का बार संचालकों को लाइसेंस देने की व्यवस्था की जा रही है। इस प्रक्रिया के तहत नगर निगम ने रजिस्ट्रेशन फीस ₹10,000 तथा लाइसेंस रिन्युअल शुल्क ₹5,000 निर्धारित किया है। इस प्रस्ताव का व्यापक प्रचार-प्रसार किया गया है, जिसके लिए नगर निगम ने राष्ट्रीय समाचार पत्रों में विज्ञापन भी प्रकाशित कराए हैं।

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इस फैसले के खिलाफ सामाजिक संगठनों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने कड़ी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि जब राज्य सरकार युवाओं को नशे से दूर रखने के लिए प्रयासरत है, तब ऐसे में नगर निगम का यह निर्णय सरकार की नीति के विपरीत है। जानकारों का कहना है कि यह निर्णय न केवल युवाओं को फिर से हुक्का सेवन की ओर आकर्षित करेगा, बल्कि स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालेगा।

कई सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि नगर निगम को राजस्व बढ़ाने के लिए ऐसे विकल्प नहीं अपनाने चाहिए जो समाज के लिए हानिकारक हों। यदि वास्तव में नगर निगम को आय के नए स्रोतों की आवश्यकता है, तो उसे जनहितकारी और स्वास्थ्यवर्धक उपायों की ओर ध्यान देना चाहिए, न कि नशे को बढ़ावा देने वाले व्यवसायों को लाइसेंस देने की दिशा में कदम उठाना चाहिए।

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अब देखना यह है कि सरकार इस मामले में क्या रुख अपनाती है। क्या नगर निगम का यह प्रस्ताव लागू होगा या फिर राज्य सरकार हस्तक्षेप कर अपने 2010 के आदेश को दोहराते हुए इसे रोकने का प्रयास करेगी। फिलहाल, देहरादून में हुक्का बार को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है, जो आने वाले दिनों में और तीखी हो सकती है।