उत्तराखंड में लागू समान नागरिक संहिता के विभिन्न प्रावधानों को चुनौती देने वाली 12 से अधिक याचिकाओं पर नैनीताल हाई कोर्ट ने बुधवार को एक साथ सुनवाई की। मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने सरकार को कड़े निर्देश देते हुए कहा है कि पूर्व में बताए गए संशोधनों की पूरी जानकारी कोर्ट के समक्ष पेश की जाए। याचिकाओं में यह तर्क दिया गया है कि सरकार ने पहले संशोधन करने की बात कही थी, लेकिन वास्तविकता में यह सुधार हुए हैं या नहीं, इसकी स्पष्टता नहीं है। अब इस मामले की अगली सुनवाई जुलाई के तीसरे सप्ताह में तय की गई है।
12 से अधिक याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई
हाई कोर्ट में UCC के खिलाफ दायर विभिन्न रिट और जनहित याचिकाओं पर सामूहिक सुनवाई हुई। इनमें उत्तराखंड जमात-ए-उलेमा हिंद के पदाधिकारियों समेत कई अन्य सामाजिक संगठनों और व्यक्तियों ने भाग लिया। याचिकाओं के माध्यम से कोर्ट को बताया गया कि वर्तमान कानून के कई प्रावधानों में सुधार की सख्त जरूरत है, ताकि वे सभी नागरिकों के हितों के अनुरूप हो सकें।
लिव-इन रिलेशनशिप जैसे नियमों को चुनौती
सुनवाई के दौरान भीमताल निवासी सुरेश सिंह नेगी द्वारा दायर जनहित याचिका का मामला भी सामने आया, जिसमें विशेष रूप से UCC के तहत ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ के पंजीकरण और उससे जुड़े प्रावधानों को चुनौती दी गई है। इसके अलावा देहरादून और बिजनौर के याचिकाकर्ताओं ने भी कानून की संवैधानिक वैधता और व्यावहारिक कठिनाइयों को लेकर अपनी आपत्तियाँ दर्ज कराई हैं।
कोर्ट ने मांगा संशोधनों का विवरण
याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि सरकार ने पूर्व में संशोधनों का दावा किया था, जिस पर खंडपीठ ने सरकार से जवाब तलब किया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अगली तिथि तक सरकार यह जानकारी उपलब्ध कराए कि संहिता में वास्तव में क्या सुधार किए गए हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए अब जुलाई के तीसरे हफ्ते में इस पर विस्तृत बहस होगी।

