उत्तराखंड की 72% महिलाओं के हाथों में पहुंचा मोबाइल, डिजिटल रेस में पहाड़ की बेटियां आगे!

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राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 (NFHS-6) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में महिलाओं के बीच मोबाइल फोन का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है, जिससे साबित होता है कि पहाड़ की महिलाएं भी डिजिटल युग में किसी से पीछे नहीं हैं। रिपोर्ट के आंकड़ों के मुताबिक, वर्तमान में उत्तराखंड की 72 प्रतिशत महिलाओं के हाथों में मोबाइल फोन पहुंच चुका है। दिलचस्प बात यह है कि पिछले तीन साल के भीतर महिलाओं द्वारा मोबाइल के इस्तेमाल में 12 प्रतिशत की शानदार बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

इस सर्वेक्षण में मुख्य रूप से 15 से 49 आयु वर्ग की महिलाओं के स्वास्थ्य, सशक्तिकरण और उनकी डिजिटल पहुंच की स्थिति का सटीक आकलन किया गया है। तुलनात्मक रूप से देखा जाए तो वर्ष 2019 से 2021 के बीच यह आंकड़ा लगभग 61 प्रतिशत था, जो अब बढ़कर 72 प्रतिशत हो गया है। भौगोलिक दृष्टि से राज्य के शहरी क्षेत्रों में 77.3 प्रतिशत और ग्रामीण क्षेत्रों में 70.4 प्रतिशत महिलाओं के पास मोबाइल फोन की उपलब्धता सुनिश्चित हो चुकी है।

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5G कनेक्टिविटी से मिला आजीविका को बढ़ावा

पहाड़ी क्षेत्रों में मोबाइल फोन के बढ़ते चलन ने महिलाओं की डिजिटल साक्षरता और सूचनाओं तक उनकी पहुंच को बेहद सुगम बना दिया है। इसका सबसे बड़ा कारण पहाड़ों में संचार कनेक्टिविटी का मजबूत होना है, जिसके चलते आज सुदूर सीमांत और दूरस्थ क्षेत्रों तक भी हाई-स्पीड 5G इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध हो चुकी है।

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इस डिजिटल क्रांति का सीधा असर महिलाओं की आर्थिक स्थिति पर पड़ा है, जहां स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से जुड़ी ग्रामीण महिलाएं अब अपने स्थानीय उत्पादों के कारोबार को ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स के जरिए आगे बढ़ा रही हैं, जिससे उनकी आजीविका में बड़ा सुधार हुआ है। यह बढ़ता डिजिटल उपयोग महिलाओं को सीधे तौर पर शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक संपर्क के आधुनिक उपकरणों से जोड़ रहा है, जो उनके समग्र विकास में सहायक सिद्ध हुआ है।

वित्तीय समावेशन में उत्तराखंड की बड़ी प्रगति

मोबाइल फोन की पहुंच के साथ-साथ राज्य में महिलाओं के वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) के क्षेत्र में भी अभूतपूर्व प्रगति देखने को मिली है। सर्वेक्षण की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड की 91 प्रतिशत महिलाओं के पास अब बैंकों में अपने स्वयं के बचत खाते सक्रिय हैं, जबकि तीन साल पहले तक यह आंकड़ा मात्र 80.2 प्रतिशत पर सीमित था।

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बैंक खातों और मोबाइल की यह बढ़ती जुगलबंदी महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता तथा वित्तीय सुरक्षा को काफी मजबूत करती है। अपने बैंक खाते होने से महिलाओं को सीधे तौर पर विभिन्न सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का पैसा बिना किसी बिचौलिए के मिलने लगा है, जिससे वे सरकारी लाभों को आसानी से उठाने में पूरी तरह सक्षम हो रही हैं।

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