संस्कृति विभाग के ठेंगे कर श्रम कानून, 5 पैसे में मजदूरी के बिल का भुगतान बना चर्चाओं का विषय….. सरकारी नियमों को खुद ही पलीता लग रहे सरकारी विभाग..

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देहरादून। देश में जहां एक तरफ न्यूनतम मजदूरी को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, वहीं उत्तराखंड का संस्कृति विभाग शायद किसी और ही दुनिया में चल रहा है। यहां महंगाई, श्रम कानून और सरकारी नियम सब कुछ “फाइलों के हिसाब” से चलता दिखाई दे रहा है। ताजा मामला ऐसा है जिसने विभागीय कार्यशैली पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। मामला सिर्फ गड़बड़ी का नहीं, बल्कि सरकारी सिस्टम की उस मानसिकता का है जिसमें नियम-कानून को मजाक बनाकर पेश किया जा रहा है।

आरटीआई से सामने आए दस्तावेजों ने खुलासा किया है कि संस्कृति विभाग के एक कार्यक्रम में वेटरों की मजदूरी महज “पांच पैसे” तय की गई। जी हां, पांच पैसे! यानी दो वेटरों के लिए कुल 10 पैसे का भुगतान दर्शाया गया। अब सवाल यह है कि आखिर पांच पैसे में कौन मजदूरी करेगा? और उससे भी बड़ा सवाल यह कि विभाग ने इस बिल को पास कैसे कर दिया?

पूरा मामला 2 नवंबर 2025 का बताया जा रहा है। मसूरी स्थित शहीद स्मारक में श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किया गया था। कार्यक्रम में टेंट-पंडाल, हाई-टी और मेहमानों की आवभगत की व्यवस्था की गई थी। इसका जिम्मा एक वेंडर को सौंपा गया। दस्तावेजों के अनुसार हाई-टी सर्व करने के लिए दो वेटर लगाए गए। लेकिन जब बिल सामने आया तो उसमें दो कर्मचारियों का कुल भुगतान 10 पैसे दर्शाया गया। यानी प्रति वेटर पांच पैसे।

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अब जरा इस “सरकारी गणित” को समझिए। जिस दौर में एक कप चाय 10 रुपये से कम नहीं मिलती, वहां संस्कृति विभाग के रिकॉर्ड में वेटर पांच पैसे में काम कर रहे हैं। यह कोई टाइपिंग मिस्टेक थी, सिस्टम एरर था या फिर फाइलों में खेल करने का नया तरीका, यह जांच का विषय है। लेकिन हैरानी इस बात की है कि इस बिल को सिर्फ लगाया ही नहीं गया, बल्कि विभागीय स्तर पर इसे सही मानते हुए भुगतान प्रक्रिया भी आगे बढ़ा दी गई।

दस्तावेज बताते हैं कि 2 नवंबर को कार्यक्रम हुआ, 3 नवंबर को बिल उपलब्ध करा दिया गया और 10 नवंबर तक भुगतान प्रक्रिया भी शुरू हो गई। यानी विभागीय मशीनरी इतनी तेज निकली कि फाइलें रॉकेट की स्पीड से दौड़ गईं। लेकिन किसी अधिकारी की नजर इस “पांच पैसे वाले मजदूर” पर नहीं पड़ी।

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विडंबना देखिए, एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी लगातार मितव्ययिता, पारदर्शिता और नियमों के पालन का पाठ पढ़ाते हैं, दूसरी तरफ विभागीय अफसर सरकारी नियमों को खुलेआम ठेंगा दिखाते नजर आ रहे हैं। श्रम कानून साफ कहता है कि किसी भी कर्मचारी को निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से कम भुगतान नहीं किया जा सकता। लेकिन संस्कृति विभाग के दस्तावेजों में तो मानो नया आर्थिक मॉडल ही तैयार कर दिया गया।

अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह सिर्फ लापरवाही है या फिर फाइलों में बड़ा खेल छिपाने की कोशिश? जानकारों का कहना है कि अक्सर ऐसे मामूली आंकड़ों के जरिए बड़े भुगतान और वित्तीय अनियमितताओं को छिपाने का खेल किया जाता है। क्योंकि यदि किसी बिल में पांच पैसे जैसी एंट्री हो सकती है तो फिर बाकी भुगतान की पारदर्शिता पर भी सवाल उठना लाजिमी है।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि विभाग में किसी ने इस पर आपत्ति तक दर्ज नहीं की। ना लेखा अनुभाग ने सवाल उठाया, ना भुगतान स्वीकृत करने वालों ने और ना ही प्रशासनिक अधिकारियों ने। मानो सरकारी खजाना नहीं, निजी दुकान चल रही हो। आरटीआई से हुए इस खुलासे ने संस्कृति विभाग की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है। विभाग संस्कृति बचा रहा है या नियमों की अर्थी निकाल रहा है, यह सवाल अब आम जनता भी पूछ रही है। क्योंकि अगर सरकारी रिकॉर्ड में पांच पैसे का वेटर संभव है, तो फिर किसी भी नियम की गंभीरता पर भरोसा कैसे किया जाए? यह मामला सिर्फ 10 पैसे का नहीं, बल्कि सरकारी जवाबदेही का है। सवाल यह भी है कि क्या विभाग अब इस पर सफाई देगा या हमेशा की तरह फाइलों के ढेर में मामला दबा दिया जाएगा। फिलहाल इस “पांच पैसे वाले वेटर” ने संस्कृति विभाग की कार्यशैली की ऐसी पोल खोल दी है, जिसकी चर्चा अब शासन से लेकर सड़क तक हो रही है।

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केंद्र द्वारा निर्धारित की गई मजदूरी…

अकुशल मजदूर: ₹478 से ₹783 प्रतिदिन
अर्द्धकुशल: ₹530 से ₹868 प्रतिदिन
कुशल मजदूर: ₹627 से ₹954 प्रतिदिन
उच्च कुशल: ₹694 से ₹1035 प्रतिदिन

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