कच्चे तेल की कीमतों में उछाल, पैकेजिंग सामग्री के महंगे होने और ईंधन की बढ़ती लागत ने आम आदमी की रसोई और घर के बजट को बिगाड़ने की तैयारी कर ली है। ईरान संघर्ष और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में आई बाधाओं के कारण फास्ट मूविंग कंज्यूमर गुड्स (FMCG) कंपनियों के मुनाफे पर भारी दबाव पड़ रहा है। डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है, जिसके परिणामस्वरूप कंपनियां अब इस बढ़ी हुई लागत का बोझ उपभोक्ताओं पर डालने की तैयारी कर रही हैं। साबुन, डिटर्जेंट, बिस्कुट और पैकेट बंद खाद्य पदार्थों जैसे उत्पादों की कीमतों में जल्द ही चरणबद्ध तरीके से बढ़ोतरी देखी जा सकती है।
कीमतों में वृद्धि का अनुमान
हिंदुस्तान यूनिलीवर, डाबर, ब्रिटानिया और नेस्ले जैसी बड़ी कंपनियों के अधिकारियों ने संकेत दिए हैं कि वे पहले ही कीमतों में 2 से 5 प्रतिशत तक की वृद्धि कर चुके हैं, लेकिन लागत का दबाव कम नहीं होने पर आगे भी दाम बढ़ाए जा सकते हैं। कंपनियां अपने मुनाफे को बचाने के लिए न केवल सीधे दाम बढ़ा रही हैं, बल्कि पैकेट का वजन घटाने (मात्रा कम करने) की रणनीति पर भी काम कर रही हैं। छोटी कीमतों वाले पैकेट (जैसे 5, 10 और 15 रुपये वाले पैक) को बाजार में बनाए रखने के लिए उनके भीतर के उत्पाद की मात्रा कम की जा सकती है ताकि बिक्री पर ज्यादा असर न पड़े। कुल मिलाकर, मौजूदा बाजार की स्थिति बहुत अस्थिर है और आने वाले महीनों में मध्यम वर्ग को महंगाई के एक और बड़े झटके के लिए तैयार रहना होगा।

