मेयरों को मिली ताकत तो बदल जाएगी 46 बड़े शहरों की सूरत: नीति आयोग की बड़ी सिफारिश

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नीति आयोग ने देश के 10 लाख से अधिक आबादी वाले 46 बड़े शहरों के कायाकल्प के लिए एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट पेश की है। आयोग का मानना है कि यदि मेयरों को अधिक अधिकार दिए जाएं और उन्हें शहर का वास्तविक प्रमुख बनाया जाए, तो जल आपूर्ति, साफ-सफाई, कचरा प्रबंधन और बस संचालन जैसी नागरिक सुविधाएं कहीं अधिक प्रभावी ढंग से जनता तक पहुँच पाएंगी। इस बदलाव से न केवल शहरी नियोजन में सुधार होगा, बल्कि शहरों के आर्थिक और सामाजिक विकास को भी नई गति मिलेगी।

जनता द्वारा सीधा चुनाव और 5 साल का कार्यकाल

नीति आयोग ने सिफारिश की है कि सभी राज्यों में मेयर का चुनाव सीधे जनता के माध्यम से कराया जाना चाहिए। इसके साथ ही, उनका कार्यकाल अनिवार्य रूप से 5 साल का होना चाहिए ताकि वे शहर के विकास के लिए लंबी अवधि की योजनाएं बना सकें और उन्हें लागू कर सकें। अभी कई जगहों पर मेयर के पास सीमित शक्तियां होती हैं, जिन्हें बढ़ाने की जरूरत है।

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मेयर-इन-काउंसिल प्रणाली की आवश्यकता

शहर के बेहतर प्रबंधन के लिए ‘मेयर-इन-काउंसिल’ प्रणाली लागू करने पर जोर दिया गया है। इसके तहत मेयर को नगर निगम का सर्वोच्च कार्यकारी निकाय घोषित किया जाना चाहिए। इस व्यवस्था में शहरी नियोजन, वित्त और मानव संसाधन जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों के अधिकार मेयर और उनके द्वारा चयनित पार्षदों की टीम के पास होंगे। साथ ही, विभागों के प्रमुखों की नियुक्ति का अधिकार भी मेयर को देने की बात कही गई है।

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नगर आयुक्त अब मेयर के नियंत्रण में होंगे

प्रशासनिक सुधारों के तहत यह सुझाव दिया गया है कि नगर आयुक्त को पूरी तरह से मेयर के अधीन काम करना चाहिए। इससे जवाबदेही तय होगी और शहर की चुनी हुई सरकार यानी नगर निगम के पास अपने शहर की सड़कों, पुलों और भूमि उपयोग के नियमों को तय करने की वास्तविक शक्ति होगी।

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राज्यों में अधिकारों का वर्तमान अंतर

रिपोर्ट में बताया गया है कि महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों में विकेंद्रीकरण बेहतर है, जहाँ स्थानीय सरकारें जल और बस सेवाओं को नियंत्रित करती हैं। इसके उलट दिल्ली, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में बस सेवाएं और शहरी नियोजन अभी भी काफी हद तक राज्य सरकारों के नियंत्रण में हैं। नीति आयोग का लक्ष्य इन विसंगतियों को दूर कर स्थानीय शासन को मजबूत बनाना है।