भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अस्थाई कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा करते हुए एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है, जिसके तहत यदि कोई कर्मचारी कई वर्षों से लगातार सरकारी विभागों में नियमित रूप से अपनी सेवाएं दे रहा है, तो उसे पक्का करने पर सरकारों को गंभीरता से विचार करना होगा। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने साफ किया है कि सिर्फ इस तकनीकी आधार पर किसी कर्मचारी को नियमित नौकरी से वंचित नहीं रखा जा सकता कि उसकी शुरुआती नियुक्ति अस्थाई रूप से या स्वीकृत पद पर नहीं हुई थी।
अदालत का यह फैसला देश भर के उन लाखों संविदा और दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों के लिए एक बड़ी उम्मीद बनकर आया है जो लंबे समय से विभागों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं, क्योंकि शीर्ष अदालत ने सरकारों को स्पष्ट संदेश दिया है कि लंबे समय तक काम लेकर किसी को भी अस्थाई दर्जे में रखना पूरी तरह अनुचित है।
उच्चतम न्यायालय ने गुवाहाटी हाईकोर्ट की खंडपीठ के पुराने फैसले को पूरी तरह रद्द करते हुए असम सरकार के विभिन्न विभागों में मास्टर रोल पर काम कर रहे पीड़ित कर्मचारियों को बड़ी राहत प्रदान की है। इस मामले में राज्य सरकार का तर्क था कि इन कर्मचारियों की शुरुआती नियुक्ति स्वीकृत पदों के अधीन नहीं हुई थी, इसलिए तय नियमों के तहत इन्हें नियमित नहीं किया जा सकता।
राज्य सरकार की इस दलील को पूरी तरह खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी कि लंबे समय की निरंतर सेवा के बाद इस तरह के तकनीकी कारणों का हवाला देकर कर्मचारियों के हक को मारना न्यायसंगत नहीं है और इसे नियमितीकरण न करने का आधार बिल्कुल नहीं बनाया जा सकता।
सरकारें नहीं कर सकतीं भेदभाव
अदालत ने सुनवाई के दौरान समानता के अधिकार पर विशेष जोर देते हुए असम सरकार की कैबिनेट नीति का जिक्र किया, जिसके तहत सरकार ने बाद में लगभग 30 हजार समान स्थिति वाले कर्मचारियों को नियमित कर दिया था। पीठ ने सख्त लहजे में कहा कि जब एक बड़ी संख्या में समान पृष्ठभूमि के कर्मचारियों को पक्का किया जा चुका है, तो ऐसी स्थिति में बाकी बचे हुए कर्मचारियों को इस प्रक्रिया से बाहर रखना पूरी तरह गलत, भेदभावपूर्ण और मनमाना रवैया है। सरकार एक ही विभाग में समान प्रकृति का कार्य करने वाले कर्मचारियों के साथ अलग-अलग व्यवहार नहीं कर सकती और समान काम के लिए सभी को समान अधिकार व सुरक्षा मिलनी ही चाहिए।
निष्पक्षता और समानता संविधान की मूल भावना
अपने फैसले के समापन में सुप्रीम कोर्ट ने सरकारों को संवैधानिक कर्तव्यों की याद दिलाते हुए कहा कि कोई भी लोकतान्त्रिक सरकार अपने कर्मचारियों से लंबे समय तक काम लेकर उन्हें जीवन भर अस्थाई दर्जे के सहारे नहीं छोड़ सकती। ऐसा करना भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त निष्पक्षता, गरिमापूर्ण जीवन और समानता की मूल भावना के सीधे विपरीत है। अदालत ने सरकारों को सख्त निर्देश दिया है कि वे अपनी नीतियों में सुधार करें और संविधान के नीति निर्देशक तत्वों तथा मूल अधिकारों के अनुरूप काम करते हुए इन कर्मचारियों के भविष्य को सुरक्षित और नियमित बनाने की दिशा में त्वरित कदम उठाएं।

