उत्तराखंड सरकार ने राज्य के विभिन्न सरकारी विभागों में वर्षों से कार्यरत उपनल संविदा कर्मचारियों को न्यूनतम वेतनमान देने की इच्छा व्यक्त करते हुए उत्तराखंड उच्च न्यायालय में एक सशर्त प्रस्ताव पेश किया है। न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की एकलपीठ के समक्ष अवमानना याचिका पर हुई सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से यह महत्वपूर्ण बात कही गई कि वे कर्मियों को न्यूनतम वेतनमान देने के लिए तैयार हैं, बशर्ते कर्मचारी अन्य नियमित कर्मचारियों की तरह किसी भी प्रकार की अतिरिक्त मांगें आगे नहीं उठाएंगे।
इसके साथ ही सरकार ने अदालत को आश्वस्त किया कि उपनल कर्मचारियों की जगह नई नियुक्तियां करने के पूर्व में लिए गए फैसले को अब पूरी तरह वापस ले लिया गया है, जिससे संविदा पर काम कर रहे कर्मियों को एक बड़ी राहत मिली है। न्यायालय ने मामले को संज्ञान में लेते हुए सरकार को निर्देशित किया है कि वह पहले इन कर्मचारियों को न्यूनतम वेतनमान देना सुनिश्चित करे, जबकि संविदा कर्मचारी संघ का आरोप है कि सरकार हाईकोर्ट के पुराने आदेशों की लगातार अवहेलना कर रही है और अब इस पूरे मामले की अगली सुनवाई आगामी 9 जून को तय की गई है।
नियमितीकरण को लेकर हाईकोर्ट में कानूनी बहस
उपनल कर्मचारियों के नियमितीकरण, चयनित वेतनमान और वेतन से जीएसटी कटौती को लेकर दायर इस याचिका में कानूनी बहस भी तेज हो गई है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, उच्च न्यायालय की खंडपीठ पूर्व में ही उपनल कर्मचारियों के नियमितीकरण के संबंध में आदेश पारित कर चुकी है, लेकिन राज्य सरकार ने इस पर अब तक कोई ठोस निर्णय नहीं लिया है और न ही इस आदेश को अदालत के रिकॉर्ड में विधिवत प्रस्तुत किया गया है।
संविदा कर्मचारी संघ ने वर्ष 2013 की नियमावली के तहत स्कंद पुष्प केंद्र में कार्यरत उपनल कर्मचारियों को नियमित किए जाने का हवाला देते हुए तर्क दिया कि इसी आधार पर राज्य के अन्य सभी विभागों में तैनात उपनल संविदा कर्मियों को भी अविलंब नियमित किया जाना चाहिए। संघ ने यह भी स्पष्ट किया कि चूंकि न्यायालय का आदेश पहले से मौजूद है, इसलिए इस विषय को दोबारा कैबिनेट में ले जाने की कोई आवश्यकता नहीं है, बल्कि सरकार को इसे सीधे लागू कर देना चाहिए।
सचिवालय से बर्खास्त कर्मियों के मामले में टली सुनवाई
इसी खबर के एक अन्य हिस्से के अनुसार, उत्तराखंड उच्च न्यायालय में विधानसभा सचिवालय से बर्खास्त किए गए कर्मचारियों की याचिकाओं पर भी सुनवाई हुई, जिसे फिलहाल टालते हुए न्यायालय ने अगली सुनवाई के लिए 2 जुलाई की तारीख मुकर्रर की है।
न्यायमूर्ति रवींद्र मैठानी की एकलपीठ के समक्ष हुई इस सुनवाई में कुलदीप सिंह सहित करीब 102 अन्य कर्मचारियों ने अपनी बर्खास्तगी को चुनौती दी है, जिनकी सेवाएं सितंबर 2022 में विधानसभा अध्यक्ष द्वारा लोकहित का हवाला देते हुए समाप्त कर दी गई थीं। सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता देवदत्त कामत और अधिवक्ता रवींद्र बिष्ट ने पैरवी करते हुए दलील दी कि बर्खास्तगी आदेश में यह बिल्कुल स्पष्ट नहीं किया गया था कि कर्मचारियों को किस आधार पर और किन ठोस कारणों से हटाया गया है, और न ही उन्हें अपना पक्ष रखने का कोई अवसर दिया गया था।
याचिकाकर्ताओं का दावा है कि उन्होंने सचिवालय में नियमित कर्मचारियों की तरह ही पूरी निष्ठा से कार्य किया है और वर्ष 2001 से 2015 के बीच बैकडोर नियुक्तियों के जरिए आए जिन 396 पदों के कर्मियों को बाद में नियमित किया गया था, उनकी तरह इनका भी पक्ष मजबूत है, इसलिए एक साथ इतने कर्मचारियों को अचानक हटा देना किसी भी तरह से लोकहित में नहीं माना जा सकता।

