देहरादून। राज्य के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल दून मेडिकल कॉलेज अस्पताल की व्यवस्था इन दिनों इलाज से ज्यादा चर्चाओं और विवादों का विषय बनती जा रही है। कभी व्यवस्थाओं पर सवाल, कभी लापरवाही के आरोप तो कभी किसी नई खामी का खुलासा—दून अस्पताल लगातार सुर्खियों में है। लेकिन अब इस पूरे घटनाक्रम के पीछे की कहानी को लेकर एक और बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। क्या दून अस्पताल की कमियों को उजागर करने के पीछे सिर्फ व्यवस्था सुधारने की मंशा है या फिर इसके साथ कोई बड़ा हित भी जुड़ा हुआ है?
दून मेडिकल कॉलेज की प्राचार्य गीता जैन ने अस्पताल को लेकर सामने आ रही लगातार नकारात्मक खबरों और आरोपों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि अस्पताल में कमियां हो सकती हैं, लापरवाही की गुंजाइश से भी इनकार नहीं किया जा सकता और जहां सुधार की जरूरत होगी, वहां सुधार किया जाना चाहिए। लेकिन हर समस्या को इस तरह पेश करना कि पूरा सरकारी अस्पताल ही बदहाल नजर आने लगे, इसके पीछे की मंशा पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।
प्राचार्य गीता जैन के मुताबिक, दून अस्पताल को लगातार बदनाम करने की कोशिशों के पीछे निजी अस्पतालों को फायदा पहुंचाने की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता। सवाल सीधा है—अगर सरकारी अस्पताल की छवि लगातार आम आदमी के बीच खराब होती चली जाएगी तो इसका सीधा फायदा आखिर किसे मिलेगा? जाहिर है, मरीज के सामने विकल्प निजी अस्पतालों का ही बचता है।
दून अस्पताल उत्तराखंड के उन चुनिंदा सरकारी संस्थानों में शामिल है जहां प्रदेश के अलग-अलग जिलों से बड़ी संख्या में मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए यह अस्पताल सिर्फ एक चिकित्सा संस्थान नहीं बल्कि उम्मीद का बड़ा केंद्र है। ऐसे में अस्पताल की हर छोटी-बड़ी कमी का असर सीधे मरीज और उनके परिवार पर पड़ता है। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या दून अस्पताल की कमियों को सुधारने के बजाय उन्हें राजनीतिक और सार्वजनिक विवाद का मुद्दा बनाना किसके हित में है?
अगर अस्पताल में लापरवाही है तो कार्रवाई होनी चाहिए। अगर डॉक्टर या कर्मचारी जिम्मेदारी में चूक रहे हैं तो जवाबदेही तय होनी चाहिए। अगर व्यवस्थाओं में खामी है तो उसे दूर किया जाना चाहिए। लेकिन अगर किसी कमी को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है, आधी-अधूरी जानकारी के आधार पर अस्पताल की पूरी व्यवस्था को कठघरे में खड़ा किया जा रहा है, तो इसकी भी जांच होनी चाहिए। क्योंकि दून अस्पताल की छवि सिर्फ अस्पताल प्रशासन की प्रतिष्ठा का सवाल नहीं है। यह हजारों मरीजों और उनके परिवारों के भरोसे का सवाल है।
अब असली सवाल यही है कि दून अस्पताल की खामियां उजागर करने की मुहिम वास्तव में व्यवस्था सुधारने की कवायद है या फिर सरकारी अस्पताल की जमीन कमजोर कर निजी अस्पतालों के लिए रास्ता मजबूत करने का खेल? प्राचार्य गीता जैन के बयान ने इस बहस को और हवा दे दी है। अस्पताल में कमियां हैं तो उन्हें दूर करने की जिम्मेदारी सिस्टम की है, लेकिन इन कमियों के बहाने अगर किसी दूसरे हित को साधने की कोशिश हो रही है तो उस पर भी पर्दा उठना जरूरी है।
दून अस्पताल को बदनाम करने से मरीजों का भरोसा टूटेगा और भरोसा टूटा तो सबसे बड़ा फायदा उसी व्यवस्था को होगा, जो सरकारी अस्पताल के कमजोर पड़ने का इंतजार कर रही है। अब देखना होगा कि आने वाले दिनों में दून अस्पताल की कमियों पर सिर्फ राजनीति होती है या फिर कमियों को दूर करने के साथ-साथ इन कमियों के पीछे की कथित राजनीति और हितों की भी पड़ताल होती है।

