उत्तराखंड हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: विकासनगर में नए स्टोन क्रशर की स्थापना पर तत्काल रोक

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उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने देहरादून जिले की विकासनगर तहसील में नए स्टोन क्रशर की स्थापना पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार, उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, उप जिलाधिकारी और खनन सचिव को नोटिस जारी कर इस संबंध में विस्तृत जवाब तलब किया है।

अदालत ने अपने आदेश में यह पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है कि राज्य में किसी भी स्टोन क्रशर को स्थापित या संचालित करने के लिए उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की अनिवार्य सहमति प्राप्त करना कानूनी रूप से आवश्यक है। नियमों का उल्लंघन कर बिना अनुमति के स्टोन क्रशर का संचालन किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं किया जाएगा और इन सभी पक्षों द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले जवाबों के आधार पर ही न्यायालय आगामी निर्णय लेगा।

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न्यायालय में यह सुनवाई विकासनगर तहसील के निवासी प्रेम सिंह पंवार द्वारा दायर की गई एक जनहित याचिका पर हुई है। याचिकाकर्ता का सीधा आरोप है कि राज्य सरकार ने ‘जय भगवती स्टोन क्रशर’ को एक संयुक्त निरीक्षण के तुरंत बाद स्थापित करने की प्रशासनिक अनुमति तो दे दी, लेकिन इसके संचालन के लिए जो सबसे आवश्यक और कानूनी रूप से अनिवार्य सहमति होती है, वह अभी तक उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से प्राप्त नहीं की गई है।

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बिना इस वैधानिक अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) के क्रशर को मंजूरी देना सीधे तौर पर तय नियमों और पर्यावरण संरक्षण कानूनों का खुला उल्लंघन है, जिसे आधार बनाकर अदालत से इस पर तुरंत रोक लगाने की गुहार लगाई गई थी।

स्थानीय आबादी पर मंडराता पर्यावरणीय खतरा

याचिका में नियमों की अनदेखी के साथ-साथ क्षेत्र को होने वाले गंभीर नुकसान और पर्यावरणीय खतरों को भी प्रमुखता से रेखांकित किया गया है। याचिकाकर्ता के अनुसार, जिस स्थान पर इस स्टोन क्रशर को लगाने का प्रस्ताव दिया गया है, उसके बिल्कुल समीप से क्षेत्र की जीवनदायिनी सुवर्ण नदी बहती है और यह पूरा इलाका घनी आबादी वाला क्षेत्र है।

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क्रशर के संचालन से निकलने वाले भारी प्रदूषण और धूल-कणों के कारण न सिर्फ सुवर्ण नदी का जल दूषित होने की प्रबल आशंका है, बल्कि आसपास की उपजाऊ कृषि भूमि और स्थानीय निवासियों के स्वास्थ्य को भी भारी नुकसान पहुंच सकता है। इन्हीं मानवीय और पर्यावरणीय क्षति की आशंकाओं को देखते हुए उच्च न्यायालय ने प्रदूषण बोर्ड, खनन सचिव और स्थानीय प्रशासन से अपना पक्ष प्रस्तुत करने को कहा है।

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