उत्तराखंड हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: स्टाफ नर्सों के वेतन रिकवरी वाला शासनादेश निरस्त

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उत्तराखंड हाई कोर्ट ने राज्य के स्वास्थ्य विभाग में कार्यरत और सेवानिवृत्त स्टाफ नर्सों के पक्ष में एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। कोर्ट ने सरकार के उस शासनादेश को पूरी तरह रद्द कर दिया है, जिसके तहत नर्सों को पहले दिए जा चुके उच्चीकृत वेतन की वसूली करने के निर्देश दिए गए थे। न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकलपीठ ने इस वसूली को नियमों के विरुद्ध माना और सरकार को आदेश दिया कि यदि किसी नर्स से वेतन की राशि वसूली जा चुकी है, तो उसे 6 महीने के भीतर वापस लौटाया जाए। इस फैसले से प्रदेश के लगभग डेढ़ हजार नर्सों को बड़ी आर्थिक राहत मिली है।

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क्या था पूरा मामला?

सेवानिवृत्त स्टाफ नर्स सुनीता सिंह और अन्य कर्मचारियों ने कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका में बताया गया कि साल 2011 में राज्य सरकार ने एक शासनादेश जारी कर नर्सों का वेतनमान ₹4200 से बढ़ाकर ₹4600 कर दिया था। हालांकि, बाद में सरकार ने एक नया शासनादेश निकालकर इस वेतन वृद्धि को त्रुटिपूर्ण माना और नर्सों को मिले अतिरिक्त पैसे की वसूली शुरू कर दी, जिसे अब हाई कोर्ट ने अवैध करार दिया है।

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कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी

अदालत ने साफ किया कि वित्त विभाग की मंजूरी के बाद ही स्टाफ नर्सों का वेतनमान बढ़ाया गया था। कोर्ट ने सरकार को यह भी सुझाव दिया कि यदि 10 दिसंबर 2011 के पुराने शासनादेश में कोई तकनीकी खामी है, तो सरकार उसे सुधारने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन इस आधार पर कर्मचारियों से पुराने वेतन की वसूली नहीं की जा सकती।

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करीब 1500 परिवारों को मिला लाभ

हाई कोर्ट के इस निर्णय का सीधा असर उत्तराखंड के 1500 वर्तमान और पूर्व स्वास्थ्य कर्मियों पर पड़ेगा। कोर्ट के सख्त रुख के बाद अब सरकार को वसूली गई राशि वापस करनी होगी, जिससे लंबे समय से मानसिक और आर्थिक तनाव झेल रहे कर्मचारियों को न्याय मिला है।

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