भाजपा विधायक अरविंद पांडेय के एक तथाकथित वायरल पत्र को लेकर उत्तराखंड की सियासत में भूचाल उठा था। लेकिन पांडेय के भाजपा कार्यालय में प्रेस कांन्फ्रेंस के बाद मामला क्लियर हो गया कि न सूत था न कपास जुलाहों में बेवजह की लट्ठम-लट्ठ हुए जा रहा था। दरअसल उत्तराखंड कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल को लगा था कि वॉयरल पत्र सूबे की सियासत के लिए बड़ा बम साबित होगा जिसके फूटने के बाद भाजपा का सियासी किला भरभरा कर गिर जाएगा और कांग्रेस चुनाव से पहले हर घर छा जाएगी। लेकिन वायरल पत्र भाजपा विधायक अरविंद पांडेय की पीसी के बाद फुस्स साबित हो गया। भाजपा फ्रंट फुट पर है और कांग्रेस को बैकफुट पर बैटिग करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। कांग्रेस की हालत अब खिसियानी बिल्ली खंबा नोचे वाली हो गई है। लेकिन बड़ा सवाल ये है कि कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल से ये चूक कैसे हो गई। कुछ लोग तो गणेश गोदियाल को ही कटघरे में खड़ा करने लगे है कि जब पत्र को लेकर तस्वीर साफ हो गई है तो वायरल पत्र को किस बुनियाद पर हव्वा बनाने की बचकानी हरकत की गई। गणेश गोदियाल ने पत्र को लेकर बड़े-बड़े दावे किए थे । गोदियाल ने भाजपा सरकार को लपेटने की जुगत भिड़ाते हुए कहा था कि जिस सरकार में उसके अपने विधायक ही सेफ न हों उस राज में आम जनता कैसे महफूज रह सकती है। बहरहाल दो-तीन दिन सूबे की सियासत में विधायक अरविंद पांडे का वायरल पत्र खूब कुलांचे भरता रहा। कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल के चेहरे को नूर को बढ़ाता रहा लेकिन अब जब खुद विधायक अरविंद पांडे ने पत्र से अपना पल्ला झाड़ लिया है तो गोदियाल के चेहरे की चमक गायब हो गई है। हालांकि गोदियाल फिर भी जांच की रट्ट लगा रहे हैं और अपने आपको परिपक्व नेता साबित कर रहे हैं। लेकिन बड़ा सवाल ये है कि जिस शख्स को बेहद काबिल समझकर कांग्रेस आलाकमान ने अपनी नैय्या के खेवनहार की जिम्मेदारी दी है उसने बिना जांच पड़ताल के या फिर बिना सियासी पैतरों को समझे बिना कागज की ऐसी तोप क्यों चलाई जिससे न धमाका हुआ न गोला निशाने पर लगा। खांमुखां बिना टीम के कप्तान गणेश गोदियाल,उस तर्ज पर बदनाम हो गए, जहां न खुदा मिला न बिसाले सनम…. जिनको आप से संजीदगी की उम्मीद थी तय है कि वो आपसे निराश हो गए होंगे।

