देहरादून। उत्तराखंड की नदियों के भविष्य को लेकर वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों के एक नए शोध ने बड़ी चिंता पैदा कर दी है। तेजी से बढ़ते तापमान और सिमटते ग्लेशियरों के कारण राज्य की प्रमुख नदियों में ग्लेशियर के पानी की हिस्सेदारी में भारी गिरावट दर्ज की गई है। गंगा की प्रमुख सहायक नदी पिंडर पर किए गए इस अध्ययन में पाया गया कि नदी के निचले हिस्सों तक पहुंचते-पहुंचते ग्लेशियर का पानी आधा रह जाता है।
अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक शोध पत्रिका ‘जर्नल ऑफ माउंटेन साइंसेज’ में यह विस्तृत अध्ययन प्रकाशित हुआ है। शोध में पिंडर नदी के उद्गम से लेकर उसके निचले प्रवाह क्षेत्रों तक पानी के अलग-अलग स्रोतों का वैज्ञानिक विश्लेषण किया गया है। रिपोर्ट से स्पष्ट हुआ है कि यदि तापमान इसी तरह बढ़ता रहा, तो आने वाले वर्षों में हिमालयी नदियों का अस्तित्व गंभीर खतरे में पड़ सकता है।
शोध के आंकड़ों के मुताबिक, पिंडर नदी के उद्गम स्थल के पास ऊपरी क्षेत्र में ग्लेशियर और बर्फ पिघलने से मिलने वाले पानी की हिस्सेदारी 96 फीसदी तक होती है। लेकिन, चौंकाने वाली बात यह है कि ग्लेशियर से मात्र 21 किलोमीटर नीचे पहुंचते ही यह हिस्सेदारी तेजी से घटकर केवल 48 फीसदी रह जाती है।
जैसे-जैसे नदी आगे की ओर बहती है, वैसे-वैसे इसमें पिघली बर्फ के पानी की जगह भूजल, बारिश और छोटी-मोटी स्थानीय सहायक नदियों का पानी मिलने लगता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि खासकर गर्मियों के मौसम में पिंडर नदी के प्राकृतिक प्रवाह को बनाए रखने में ग्लेशियर से ज्यादा अब भूजल की भूमिका मुख्य हो गई है।
अध्ययन से स्पष्ट हुआ है कि ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और बर्फबारी कम होने के कारण नदियों की निर्भरता अब पूरी तरह मानसूनी बारिश और भूजल पर होती जा रही है। वैज्ञानिकों ने आगाह किया है कि अगर व्यापक स्तर पर अध्ययन किया जाए, तो उत्तराखंड की अन्य हिमालयी नदियों में भी यही खतरनाक ट्रेंड देखने को मिलेगा।
भौगोलिक दृष्टि से पिंडर नदी अलकनंदा की प्रमुख सहायक नदी है। आगे चलकर अलकनंदा देवप्रयाग में भागीरथी से मिलती है, जहां से पवित्र गंगा नदी का निर्माण होता है। ऐसे में पिंडर नदी के जलस्तर में आ रही यह गिरावट सीधे तौर पर गंगा के कुल जल प्रवाह को प्रभावित कर सकती है।
वैज्ञानिकों ने शोध के दौरान कुमाऊं हिमालय के दो सबसे प्रमुख और तेजी से पिघलने वाले ग्लेशियरों पिंडारी और कफनी के पानी के आइसोटोप स्तर की गहन जांच की। जांच में दोनों ग्लेशियरों के पानी का आइसोटोप स्ट्रक्चर अलग-अलग मिला, जिससे यह सिद्ध होता है कि दोनों ही ग्लेशियरों की पानी को लंबे समय तक स्टोर करके रखने की प्राकृतिक क्षमता घट रही है।
वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी और सर्दियों में कम बर्फबारी को इसका सबसे मुख्य कारण माना गया है। यदि ग्लेशियरों के पिघलने की यही रफ्तार रही, तो गर्मियों की शुरुआत में ही नदियां सूखने की कगार पर पहुंच सकती हैं।
इस महत्वपूर्ण शोध को वाडिया संस्थान के भू-वैज्ञानिकों और सिम्बायोसिस इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी, पुणे के शोधकर्ताओं ने मिलकर अंजाम दिया है। वैज्ञानिकों का निष्कर्ष है कि हिमालयी क्षेत्र के जल संसाधनों और ग्लेशियरों को बचाने के लिए अब केवल शोध तक सीमित न रहकर ठोस नीतियां बनाने और तत्काल कड़े कदम उठाने की सख्त आवश्यकता है।

