देहरादून। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने वन विभाग में संविदा पर कार्यरत कर्मचारियों को ‘समान कार्य के लिए समान वेतन’ और ईपीएफ देने संबंधी अदालती आदेश का अनुपालन न करने पर बेहद सख्त रुख अपनाया है। न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की एकलपीठ ने राज्य के प्रिंसिपल सचिव और प्रमुख वन संरक्षक को अवमानना नोटिस जारी कर 28 अक्टूबर 2026 तक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
यह अवमानना याचिका वन विभाग में संविदा पर तैनात अर्जुन सिंह और अन्य कर्मचारियों ने दायर की है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, उच्च न्यायालय की एकलपीठ ने 19 मार्च 2026 को आदेश दिया था कि कर्मचारियों के प्रत्यावेदन पर सक्षम प्राधिकारी तीन महीने के भीतर फैसला लें। हालांकि, तय समयसीमा बीत जाने के बाद भी अधिकारियों ने इस पर कोई संज्ञान नहीं लिया।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि वे वर्ष 2014-15 से लगातार सेवाएं दे रहे हैं। राज्य सरकार के 16 अगस्त 2017 के शासनादेश के अनुसार उपनल और आउटसोर्स कर्मचारियों के साथ एक जैसा व्यवहार होना चाहिए। इसके बावजूद उपनल कर्मियों को अधिक वेतन व सुविधाएं दी जा रही हैं, जबकि आउटसोर्स कर्मियों को बेहद कम वेतन पर काम कराया जा रहा है जो नियमावली के विरुद्ध है।
इसी सुनवाई के दौरान उत्तराखंड हाईकोर्ट ने नेशनल हेल्थ मिशन के तहत तैनात डॉक्टरों को भी बड़ी राहत दी है। मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ साह की खंडपीठ ने नगर आयुक्त देहरादून को निर्देश दिया है कि आठ एमबीबीएस डॉक्टरों के रुके हुए वेतन का 75 फीसदी भुगतान 10 दिन के भीतर हर हाल में किया जाए।
अदालत ने आदेश में स्पष्ट किया कि डॉक्टरों की शेष 25 प्रतिशत राशि का भुगतान 4 सप्ताह के भीतर पूरा किया जाए। कोर्ट ने डॉक्टरों को आवश्यक दस्तावेजी औपचारिकताएं पूरी करने के लिए एक सप्ताह का समय देते हुए इस याचिका को पूरी तरह से निस्तारित कर दिया।
गौरतलब है कि डॉ. ऋषि मृदुल सहित आठ युवा डॉक्टरों ने निजी क्षेत्र के बेहतर मौकों को छोड़कर एनएचएम के तहत देहरादून और हरिद्वार के अर्बन हेल्थ एंड वेलनेस सेंटरों में सेवाएं शुरू की थीं। रोज लगभग 70 मरीजों का इलाज कर रहे इन डॉक्टरों का वेतन मार्च से अचानक रोक दिया गया था, जिस पर अदालत ने त्वरित कार्रवाई का आदेश दिया है।

