देहरादून में सूख रहे हैं नलकूप और हैंडपंप! लाडपुर में 81 मीटर नीचे भागा पानी, CGWB की रिपोर्ट ने उड़ाए होश

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देहरादून। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में कम बारिश और जमीन के नीचे से पानी के बेतहाशा दोहन ने एक बड़ा जल संकट खड़ा कर दिया है। केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) की ताजा रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि दून घाटी में पेयजल संकट अब बेहद गंभीर रूप ले चुका है। अगर समय रहते रेन वाटर हार्वेस्टिंग जैसे कदम नहीं उठाए गए तो स्थिति बेकाबू हो सकती है।

इस गिरते वाटर लेवल का सीधा और खतरनाक असर स्थानीय जनता की रोजमर्रा की आपूर्ति और किसानों की आजीविका पर पड़ रहा है। जिले के ट्यूबवेलों से पानी मिलने की औसत दर गर्मियों में घटकर महज 300 लीटर प्रति मिनट तक सिमट गई है, जो सामान्य दिनों में 2205 से 2520 लीटर प्रति मिनट होती थी।

क्या है पूरा मामला और कहाँ है सबसे ज्यादा संकट?

CGWB की रिपोर्ट के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, देहरादून में प्री-मानसून के दौरान भूजल स्तर 1.94 से 64.72 मीटर तक रिकॉर्ड किया गया है। वहीं, पोस्ट-मानसून में यह गहराई 1.47 से 55.78 मीटर तक चली जाती है।

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देहरादून के शहरी इलाकों में पानी का स्तर बहुत तेजी से नीचे खिसका है। सहस्त्रधारा रोड क्षेत्र के तरला नांगल में भूजल की गहराई 70.61 मीटर दर्ज की गई है। वहीं, लाडपुर इलाके में स्थिति सबसे ज्यादा खराब है, जहां वाटर लेवल 81.99 मीटर की डरावनी गहराई तक पहुंच गया है।

लाडपुर और तरला नांगल के अलावा नत्थनपुर, नवादा, नांगल हटनाला और कौलागढ़ जैसे सघन आबादी वाले क्षेत्रों में भी हैंडपंप और ट्यूबवेल सूखने की कगार पर हैं। इसके विपरीत, ऋषिकेश में भूजल स्तर 4.67 मीटर, भोपालपानी में 6.64 मीटर, गुलरघाटी में 12.1 मीटर और कांवली में 12.57 मीटर दर्ज किया गया है।

जून में 47% कम बारिश ने बिगाड़ा खेल

मौसम विभाग के आंकड़ों ने इस संकट को और ज्यादा बढ़ा दिया है। उत्तराखंड में इस बार 27 जून तक सामान्य से 41 फीसदी कम वर्षा दर्ज की गई है। वहीं, देहरादून में सामान्य से 47 फीसदी कम बारिश हुई है।

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मौसम विज्ञान केंद्र के निदेशक डॉ. सीएस तोमर के अनुसार, प्रदेश में 150.5 मिमी की सामान्य वर्षा के मुकाबले अब तक केवल 88.1 मिमी बारिश ही हो सकी है। हरिद्वार में 80 और ऊधमसिंह नगर में 78 फीसदी कम बारिश रिकॉर्ड की गई है।

इस कम बारिश के कारण किसानों पर दोहरी मार पड़ी है। भारतीय किसान मजदूर संगठन के राष्ट्रीय प्रवक्ता अरुण शर्मा ने बताया कि नहरें मलबे से पटी होने के कारण सिंचाई का पानी खेतों तक नहीं पहुंच रहा है। इससे चारा, सब्जी, गन्ना, टमाटर और मक्के की फसल के साथ-साथ धान की रोपाई भी बुरी तरह प्रभावित हो रही है।

क्या है समाधान?

केंद्रीय भूजल बोर्ड के क्षेत्रीय निदेशक प्रशांत राय ने सुझाव दिया है कि शहरों में रूफटॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग को अब अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। इसके साथ ही कृत्रिम भूजल रिचार्ज और निर्माण गतिविधियों पर कड़ा नियंत्रण जरूरी है। पहाड़ी भूभाग होने के कारण बोर्ड अब टेलीमेट्री प्रणाली से झरनों के डिस्चार्ज पर नजर रख रहा है।

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जल संस्थान के उत्तर डिवीजन के ईई संजय सिंह ने बताया कि भीषण गर्मी के कारण आईटी पार्क और कौलागढ़ के 25 ट्यूबवेलों का डिस्चार्ज घटकर केवल 8 MLD रह गया है। वहीं पिथूवाला डिवीजन के ईई बलदेव डोगरा ने कहा कि सहस्रपुर में 3.77 मीटर और कुआंवाला में 3.94 मीटर पर जलस्तर है, लेकिन कई ट्यूबवेल नीचे चले गए हैं।

दक्षिण डिवीजन के ईई आशीष भट्ट के अनुसार, बांदल स्रोत की क्षमता 20 MLD और बीजापुर की 7 MLD है, लेकिन गर्मियों में बांदल का डिस्चार्ज घटकर आधा यानी 10 MLD रह जाता है। अंग्रेजों के जमाने से दून को पानी देने वाले ये स्रोत अब भारी दबाव में हैं।

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