देशभर में पड़ रही रिकॉर्डतोड़ प्रचंड गर्मी और जानलेवा लू के संकट पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। इस गंभीर पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संकट को देखते हुए एनजीटी ने केंद्र सरकार के साथ-साथ उत्तराखंड समेत कई प्रभावित राज्य सरकारों को औपचारिक नोटिस जारी किया है। ट्रिब्यूनल ने इन सभी सरकारों को सख्त निर्देश दिया है कि वे आगामी 18 अगस्त से पहले इस जानलेवा गर्मी से निपटने के लिए अपनी पूरी कार्ययोजना कोर्ट के समक्ष पेश करें।
एनजीटी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव और विशेषज्ञ सदस्य डॉ. अफरोज अहमद की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि बढ़ते तापमान को अब हल्के में नहीं लिया जा सकता और इससे निपटने के लिए प्रशासनिक स्तर पर तुरंत ठोस और दूरगामी कदम उठाए जाने की सख्त जरूरत है।
गर्मी देश की सबसे उपेक्षित आपदा
सुनवाई के दौरान एनजीटी की पीठ ने एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि अत्यधिक गर्मी और लू के विनाशकारी प्रभाव अक्सर अन्य प्राकृतिक आपदाओं की तरह तुरंत प्रत्यक्ष रूप से नजर नहीं आते हैं। यही वजह है कि हीटवेव को देश की सबसे उपेक्षित आपदा माना गया है, जिस पर प्रशासन का ध्यान काफी देर से जाता है।
इस बार उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में स्थिति बेहद भयावह हो चुकी है, जहाँ पारा रिकॉर्ड 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है। इसके अलावा देश के कई अन्य राज्य भी इस समय भीषण लू की चपेट में झुलस रहे हैं, जिसने आम जनजीवन को पूरी तरह से अस्त-व्यस्त कर दिया है।
देश की अर्थव्यवस्था पर विनाशकारी प्रभाव
एनजीटी ने सरकारों को सचेत करते हुए इस बात को रेखांकित किया कि इस प्रचंड गर्मी और निरंतर चलती लू का असर केवल तापमान बढ़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका चौतरफा नुकसान हो रहा है। इस भीषण मौसम के कारण आम लोगों की सेहत पर बेहद बुरा असर पड़ रहा है और अस्पतालों में मरीजों की संख्या बढ़ रही है।
इसके साथ ही खेतों में खड़ी फसलों के झुलसने से कृषि क्षेत्र को भारी नुकसान हो रहा है, जिससे सीधे तौर पर उत्पादन प्रभावित हो रहा है। ट्रिब्यूनल ने चेतावनी दी है कि यदि इस संकट पर समय रहते नियंत्रण नहीं पाया गया, तो यह हमारे देश की उत्पादकता और संपूर्ण अर्थव्यवस्था पर एक विनाशकारी प्रभाव छोड़ेगा।

