हरिद्वार में मतदाता सूची सत्यापन पर विवाद: 20 हजार साधु-संतों के वोटर आईडी पर संकट

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हरिद्वार। धर्मनगरी हरिद्वार में विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान साधु-संतों की गुरु-शिष्य परंपरा और निर्वाचन व्यवस्था के नियमों के बीच बड़ा टकराव देखने को मिल रहा है। मतदाता सूची के सत्यापन के दौरान गृहस्थ जीवन के पुराने पारिवारिक रिकॉर्ड और जैविक माता-पिता का विवरण मांगे जाने से अखाड़ों, आश्रमों, मठों और मंदिरों में रहने वाले लगभग 20 हजार संतों के सामने मतदाता पहचान पत्र रद्द होने का संकट खड़ा हो गया है। निर्वाचन विभाग द्वारा बड़ी संख्या में नोटिस जारी किए जाने के बाद संतों ने इस विसंगति को लेकर गहरी चिंता जताई है।

हरिद्वार के विभिन्न अखाड़ों और आश्रमों में रहने वाले अधिकांश साधु-संतों ने किशोरावस्था या युवावस्था में ही गृहस्थ जीवन और घर-परिवार का पूरी तरह त्याग कर संन्यास ग्रहण कर लिया था। संन्यास दीक्षा के बाद सनातन परंपरा के अनुसार उनकी सामाजिक, धार्मिक और कानूनी पहचान केवल गुरु परंपरा से ही संचालित होती है। इसी आधार पर कई संतों ने अपने मतदाता पहचान पत्र, राशन कार्ड, आधार कार्ड, बैंक खातों और आश्रम के अभिलेखों में जैविक पिता के स्थान पर अपने दीक्षा गुरु का नाम दर्ज कराया है।

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एसआईआर प्रक्रिया के तहत निर्वाचन आयोग द्वारा माता-पिता के नाम, जन्मस्थान, पुराने निवास और वर्ष 2003 के पारिवारिक विवरण मांगे जाने पर व्यावहारिक कठिनाई खड़ी हो गई है। जिन संतों ने दशकों से अपने गृहस्थ परिवार से कोई संबंध नहीं रखा है, उनके लिए जैविक माता-पिता का रिकॉर्ड प्रस्तुत करना असंभव साबित हो रहा है। दस्तावेजों में दर्ज गुरु के नाम और सत्यापन फॉर्म में मांगे जा रहे जैविक पिता के विवरण का मिलान न होने के कारण कई संतों को चुनाव आयोग की ओर से नोटिस भेजे जा रहे हैं।

निर्वाचन विभाग द्वारा आयु वर्ग के हिसाब से दो से तीन पुराने दस्तावेज मांगे जा रहे हैं। 18 से 21 वर्ष के संतों से अपना पहचान पत्र और माता-पिता का वर्ष 2003 का वोटर आईडी मांगा गया है। वहीं 22 से 39 वर्ष तथा 40 वर्ष से अधिक आयु के साधुओं से अपना पहचान पत्र और पिता का 2003 का मतदाता पहचान पत्र प्रस्तुत करने का नोटिस मिला है। इस मामले पर उत्तराखंड के मुख्य निर्वाचन अधिकारी बीवीआरसी पुरुषोत्तम ने कहा कि सभी जिलाधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश जारी कर दिए गए हैं और 2003 के दस्तावेज देखकर ऐसे प्रकरणों को निपटाने के निर्देश दिए गए हैं।

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इस गंभीर मुद्दे पर संतों ने पिछले दिनों आयोजित ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ संत समागम के दौरान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के समक्ष भी अपनी बात रखी थी। मामले पर जिला प्रशासन का कहना है कि यदि संबंधित अखाड़े संतों की पहचान को लेकर आधिकारिक रूप से लिखकर देंगे, तो इस समस्या के समाधान के उचित प्रयास किए जाएंगे। संतों की मांग है कि सनातन धर्म की संन्यास परंपरा का सम्मान करते हुए उनके सत्यापन को केवल अखाड़े के प्रमाण पत्र और गुरु परंपरा के आधार पर ही मान्य किया जाना चाहिए।

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पंचायती बड़ा अखाड़ा उदासीन के महंत राघवेंद्र दास ने इस प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि अखाड़ा परंपरा में दीक्षा के बाद शिष्य को नई धार्मिक पहचान मिलती है और वर्षों से सरकारी दस्तावेजों में यही विवरण दर्ज चला आ रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल नाम के प्रारूप या पारिवारिक कॉलम के आधार पर संतों के मताधिकार पर सवाल उठाना बिल्कुल अनुचित है। प्रशासन को संतों के गुरु-शिष्य रिकॉर्ड को ही आधार मानकर वोटर लिस्ट का सत्यापन करना चाहिए ताकि किसी भी संत को अपने लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित न होना पड़े।

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