उत्तराखंड सरकार की महत्वाकांक्षी ‘मुख्यमंत्री सौर स्वरोजगार योजना’ वर्तमान में प्रशासनिक पेचीदगियों के कारण लाभार्थियों के लिए मुसीबत का सबब बन गई है। मुख्य विवाद उद्योग विभाग द्वारा सब्सिडी जारी करने के लिए अनिवार्य किया गया GST पंजीकरण है, जिसके कारण बड़ी संख्या में आवेदकों की सब्सिडी रुक गई है। विडंबना यह है कि केंद्र सरकार पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि सौर ऊर्जा से उत्पादित बिजली की खरीद-बिक्री GST के दायरे से बाहर है, फिर भी विभाग इस शर्त पर अड़ा हुआ है। सब्सिडी न मिलने के कारण लाभार्थियों को बैंकों के भारी ऋण की किस्तें चुकाने में भारी आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ रहा है, जिससे योजना का मूल उद्देश्य ही खतरे में पड़ता नजर आ रहा है।
GST पंजीकरण का नियम और तार्किक विसंगतियां
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा तकनीकी विरोधाभास यह है कि जब बिजली की बिक्री पर कोई टैक्स लागू ही नहीं होता, तो लाभार्थियों को GST पंजीकरण के लिए क्यों मजबूर किया जा रहा है। यदि लाभार्थी विभाग के दबाव में पंजीकरण करा भी लेते हैं, तो उन्हें हर तीन महीने में ‘शून्य’ रिटर्न दाखिल करने की अतिरिक्त कागजी कार्यवाही करनी होगी, जो उनके लिए अनावश्यक बोझ है। इसी नियम के चलते विभाग ने कई सब्सिडी आवेदनों को निरस्त कर दिया है। हालांकि, ऊर्जा सचिव आर. मीनाक्षी सुंदरम ने आश्वासन दिया है कि विभाग को स्पष्ट किया जा रहा है कि बिजली बिक्री GST मुक्त है और वे इन मामलों के समाधान का प्रयास कर रहे हैं।
जमीन का भू-उपयोग परिवर्तन और नई जांच का विवाद
सब्सिडी अटकने का दूसरा मुख्य कारण कृषि भूमि के भू-उपयोग परिवर्तन (धारा 143) की अनिवार्यता और जमीनों की दोबारा जांच है। लाभार्थियों का आरोप है कि केंद्र के नियमों के अनुसार सौर परियोजनाओं के लिए भू-उपयोग परिवर्तन की आवश्यकता नहीं है और कई जगहों पर पैनलों के नीचे खेती भी की जा रही है, लेकिन विभाग इसे अनिवार्य मानकर सब्सिडी रोक रहा है। इसके साथ ही, उद्योग विभाग ने अब जमीनों के स्वामित्व की नए सिरे से जांच शुरू कर दी है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सौर प्लांट सरकारी भूमि पर तो नहीं लगे हैं। इस नई प्रक्रिया से न केवल लाभार्थियों की फाइलें लटक गई हैं, बल्कि जिला प्रशासन पर भी काम का अतिरिक्त बोझ बढ़ गया है।

