वाकई में उत्तराखंड के चौथे मुख्यमत्री मेजर जनरल वी.सी. खडूड़ी को बिसर जाना आसान नहीं होगा..जनरल भुलाए जाने वाले व्यक्तित्व थे ही नहीं ..जनरल खंडूड़ी का न रहना भाजपा के लिए ही नहीं बल्कि समूचे उत्तराखंड के लिए एक बड़ा नुकसान है। जनरल वी.सी.खंडूडी इस पहाड़ी राज्य के लिए एक अभिभावक थे। वे उत्तराखंड की पीड़ा को बहुत करीब से जानते थे। राज्य आंदोलन में जनरल साहब का बड़ा योगदान था।
जब राज्य आंदोलन की आग से समूचा उत्तराखंड तप रहा था तब जनरल बीसी खंडूड़ी गढ़वाल सांसद थे। उनका उस दौरान दिया सदन में दिया गया भाषण कोई नहीं भूलता. सदन में जनरल साहब जब अलग उत्तराखंड आंदोलन के पक्ष में गरजे तो सत्ता पक्ष सिहर गया। बहरहाल अलग राज्य बनने के बाद जब राज्य में सन 2007 में भाजपा की सरकार बनी उस वक्त भाजपा आलाकमान ने ईमानदार जनरल साहब को उत्तराखंड का मुख्यमंत्री बनाया।
सीएम बनते ही जनरल बी.सी. खंडूडी ने बेपटरी हुए उत्तराखंड को पटरी पर लाने की कवायद शुरू की। कई कड़े फैसले लिए जैसे सबसे पहले राजधानी चयन आयोग को समाप्त किया। दरअसल पूर्ववर्ती एनडी तिवारी की कांग्रेस सरकार ने उत्तराखंड की राजधानी चयन के लिए बने आयोग का कार्यकाल बढ़ा दिया था। जिससे जनता नाराज थी।
जनरल साहब की रग-रग में सेना का अनुशासन कूट-कूट के भरा हुआ था। लिहाजा वे खुद भी अनुशासन मे रहते और अपने सभी विधायक साथियों से भी अनुशासन में रहने की उम्मीद करते थे। ईमानदार जनरल साहब को फिजूलखर्ची कतई पसंद नही थी। उनका मिजाज बेशक बाहर से कड़क था लेकिन भीतर से बेहद नरम था।
उत्तराखंड सलामत रहे इसके लिए जनरल साहब ने जमीनो की खरीद-फरोख्त पर कानून बना कर अकुंश लगाने का काम किया। राज्य में भ्रष्टाचार मुक्त शासन देने में जनरल बीसी खंडूडी के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। उनका मुख्यमंत्री काल सुशासन के लिए विख्यात है । जनरल खंडूरी ने उत्तराखंड में देश का सबसे सख्त लोकायुक्त बिल पेश किया था। जिसमे मुख्यमंत्री को भी जांच के दायरे में रखा गया था।
उन्होंने अफसरो को जनता को प्रति जवाबदेह बनाने के लिए सुराज कानून बनाया था ताकि आम जनता को दफ्तरों के चक्कर न काटने पड़ें। जिस तबादले को राज्य में इंडस्ट्री माना जाता था उसके लिए जनरल साहब ने नियम काएदे बना दिए थे। ताकि तबादलों में पारदर्शिता बनी रहे। सिफारिशी तबादलों पर रोक लग सके।
जनरल साहब खुद को जनता के प्रति जवाबदेह मानते थे तो सहयोगियों और जिम्मेदार पदो पर बैठे अफसरों से भी जनता के प्रति जवाबदेही चाहते थे। यही वजह थी कि राज्य में उन्होने लोकायुक्त कानून बनाया था. बहरहाल भारतीय सेना के इंजीनियरिंग कोर के जांबाज अफसर को अटल बिहारी बाजपेयी बेहद पसंद करते थे।
कहते हैं कि अटल जी की वजह से ही जनरल साहब राजनीति में आए थे। अटल जी को जनरल साहब पर बड़ा भरोंसा था। जनरल साहब जब पहली बार लोकसभा के सदस्य बने तो दो साल के भीतर ही उन्हे भाजपा ने पार्टी का मुख्य सचेतक नियुक्त कर दिया जो बहुत अहम पद था। वहीं अटल जी जब पीएम बने तो जनरल साहब को भूतल परिवहन महकमे की जिम्मेदारी दी गई थी।
जनरल साहब ने उस दौरान वो काम किया कि मीडिया ने जनरल बी.सी.खंडूडी को आधुनिक भारत का शेरशाह सूरी तक कहा। बहरहाल उत्तराखंड में सियासी गुटबाजी के चलते जनरल साहब अपना सीएम का पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए थे लेकिन ईमानदारी की जो लाइन उन्होने खींची थी वो मिसाल बन गई।
नतीजा ये हुआ कि जनता के बीच बढ़ती नाराजगी को देखकर भाजपा आलाकमान को जनरल जरूरी लगे लिहाजा साल 2011 में फिर से जनरल साहब को उत्तराखंड की कमान सौंपनी पड़ी और चुनाव में उतरने के लिए नारा गढ़ना पड़ा खंडूड़ी है जरूरी। संदेश साफ था कि खंडूडी सिर्फ जनता के लिए ही नहीं बल्कि भाजपा के लिए भी जरूरी हैं। आज जनरल खंडूड़ी 92 साल की उम्र में अलविदा कह गए हैं..अब अहसास हो रहा है कि वाकई में जनरल खंडूडी जरूरी थे।

