देहरादून। उत्तराखंड का स्वास्थ्य महकमा इन दिनों एक अजीब व्यवस्था का प्रतीक बनता जा रहा है, जहां सरकार, शासन और तबादला नीति सब कुछ कागजों तक सीमित नजर आ रही है, जबकि असली ताकत कुछ अधिकारियों और डॉक्टरों के हाथों में दिखाई दे रही है।
हालात ऐसे हैं कि सरकार व्यवस्था सुधारने के नाम पर तबादले करती है, शासन आदेश जारी करता है, लेकिन जमीन पर उन आदेशों की क्या हैसियत है, इसका अंदाजा स्वास्थ्य विभाग की मौजूदा स्थिति से आसानी से लगाया जा सकता है। हाल ही में स्वास्थ्य विभाग में बड़े पैमाने पर तबादले किए गए।
दावा किया गया कि इससे व्यवस्थाएं सुधरेंगी और जरूरत के अनुसार अधिकारियों की तैनाती होगी। लेकिन तबादला सूची जारी होने के महज 72 घंटे के भीतर ही संशोधन आदेश जारी हो गए। इससे साफ संकेत मिला कि कहीं न कहीं दबाव, प्रभाव और लॉबिंग का खेल पर्दे के पीछे चल रहा है।
मजेदार बात यह है कि संशोधन के बाद भी कई अधिकारी अपनी मूल या नई तैनाती पर जाने को तैयार नहीं हैं। एक सप्ताह से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन कई अफसर अब तक नए तैनाती स्थल पर ज्वाइन नहीं कर पाए हैं।
सवाल यह है कि यदि एक आम कर्मचारी सरकारी आदेश की अवहेलना करे तो उसके खिलाफ कार्रवाई तय मानी जाती है, लेकिन जब बड़े अधिकारी और डॉक्टर ऐसा करते हैं तो पूरा सिस्टम खामोश क्यों हो जाता है?
सरकारी आदेशों में स्पष्ट लिखा जाता है कि अधिकारी तत्काल प्रभाव से नवीन तैनाती स्थल पर कार्यभार ग्रहण करेंगे। लेकिन स्वास्थ्य विभाग में यह “तत्काल” आखिर कितने दिनों या हफ्तों का होता है, इसका जवाब शायद शासन के पास भी नहीं है। आदेश जारी हो रहे हैं, संशोधन हो रहे हैं, लेकिन पालन कौन कर रहा है, यह सबसे बड़ा सवाल बन गया है।
एक समय कहा जाता था कि चुनाव से छह महीने पहले अधिकारी अपनी सुविधानुसार काम करने लगते हैं क्योंकि तब राजनीतिक और प्रशासनिक पकड़ कमजोर पड़ जाती है। लेकिन यहां तो विधानसभा चुनाव में अभी करीब एक साल का समय बाकी है और हालात पहले से ही ऐसे बन चुके हैं कि सरकारी आदेशों की गंभीरता पर सवाल उठने लगे हैं।
स्वास्थ्य विभाग की मौजूदा तस्वीर यही संदेश दे रही है कि यहां सरकार नहीं, बल्कि कुछ प्रभावशाली अधिकारी और डॉक्टर अपनी शर्तों पर व्यवस्था चलाते दिखाई दे रहे हैं। तबादले होते हैं, फिर संशोधन होते हैं, फिर भी कई अधिकारी ज्वाइनिंग नहीं करते और कोई जवाबदेही तय नहीं होती।
ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर स्वास्थ्य महकमे में राज किसका चल रहा है-सरकार का, शासन का या फिर उन अधिकारियों का जो आदेशों को अपनी सुविधा के हिसाब से मानते और टालते हैं? वहीं सूत्र बताते है कि एक महिला अधिकारी तो मंत्रालय से लेकर शासन तक अपने तबादले में संशोधन के लिए चक्कर काट रही है जिससे तबादले से बचा जा सके। अब देखना होगा कि शासन ऐसे अधिकारियों के खिलाफ कोई सख्त कदम उठाता है या फिर यह मामला भी फाइलों और आदेशों के बीच दबकर रह जाएगा।

