देहरादून/चंपावत। उत्तराखंड के चंपावत जिले में सामने आए चर्चित नाबालिग दुष्कर्म प्रकरण में पुलिस जांच के दौरान बड़ा खुलासा हुआ है। शुरुआती तौर पर सामूहिक दुष्कर्म के गंभीर आरोपों के बाद दर्ज हुए मामले में अब पुलिस की वैज्ञानिक और तकनीकी जांच ने कथित तौर पर एक सुनियोजित साजिश की परतें खोल दी हैं। पुलिस के अनुसार, बदले की भावना से प्रेरित होकर पूरे घटनाक्रम को रचा गया था।
जानकारी के अनुसार, 6 मई 2026 को पीड़िता के परिजनों द्वारा कोतवाली चंपावत में तहरीर देकर आरोप लगाया गया था कि 5 मई की रात उनकी 16 वर्षीय नाबालिग पुत्री के साथ तीन व्यक्तियों ने दुष्कर्म किया। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए पुलिस ने तत्काल पोक्सो एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया। पुलिस अधीक्षक चंपावत श्रीमती रेखा यादव के निर्देश पर क्षेत्राधिकारी चंपावत के पर्यवेक्षण में 10 सदस्यीय एसआईटी टीम गठित की गई और जांच शुरू की गई।
पुलिस अधीक्षक ने स्वयं पीड़िता से बातचीत की और घटनास्थल का निरीक्षण कर स्थानीय लोगों से जानकारी जुटाई। वहीं आरएफएसएल की टीम को बुलाकर घटनास्थल का वैज्ञानिक परीक्षण कराया गया। पीड़िता का मेडिकल परीक्षण, सीडब्ल्यूसी के समक्ष काउंसलिंग और न्यायालय में बयान भी दर्ज कराए गए।
विवेचना के दौरान पुलिस को कई ऐसे तथ्य मिले, जिन्होंने पूरे मामले की दिशा बदल दी। जांच में सामने आया कि पीड़िता गांव सल्ली में आयोजित एक विवाह समारोह में अपनी इच्छा से अपने एक दोस्त के साथ गई थी। घटना के दिन उसकी गतिविधियों और विभिन्न स्थानों पर मौजूदगी की पुष्टि सीसीटीवी फुटेज और कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर) से हुई।
पुलिस के मुताबिक मेडिकल परीक्षण में किसी प्रकार की बाहरी या आंतरिक चोट, संघर्ष अथवा जबरदस्ती के स्पष्ट संकेत नहीं मिले। वहीं कुछ गवाहों के बयान भी तकनीकी और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों से मेल नहीं खाते पाए गए। जांच में यह भी सामने आया कि कमल रावत, पीड़िता और उसकी महिला मित्र के बीच घटना वाले दिन लगातार कई बार बातचीत और संपर्क हुआ था, जिसे पुलिस पूरे घटनाक्रम में महत्वपूर्ण मान रही है।
सबसे अहम तथ्य यह सामने आया कि जिन तीन लोगों—विनोद सिंह रावत, नवीन सिंह रावत और पूरन सिंह रावत—को नामजद किया गया था, उनकी घटनास्थल पर मौजूदगी ही नहीं पाई गई। पुलिस ने तकनीकी साक्ष्यों और गवाहों के बयानों के आधार पर दावा किया कि घटना के समय तीनों मौके पर मौजूद नहीं थे।
पुलिस के अनुसार, प्रारंभिक जांच में यह संकेत मिले हैं कि कमल रावत ने बदले की भावना से प्रेरित होकर नाबालिग को बहला-फुसलाकर पूरा घटनाक्रम तैयार कराया। हालांकि पुलिस ने स्पष्ट किया है कि डिजिटल और फॉरेंसिक साक्ष्यों की विस्तृत जांच अभी जारी है और सभी पहलुओं पर गंभीरता से पड़ताल की जा रही है।
पुलिस अधीक्षक रेखा यादव ने कहा कि महिला एवं बाल अपराधों के प्रति उत्तराखंड पुलिस की “ज़ीरो टॉलरेंस” नीति है। लेकिन यदि किसी मामले में झूठे आरोप या भ्रामक तथ्य सामने आते हैं तो ऐसे मामलों में भी कानून के तहत सख्त कार्रवाई की जाएगी। पुलिस ने मीडिया और आमजन से अपील की है कि मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए केवल सत्यापित तथ्यों का ही प्रसारण और प्रकाशन करें।

