उत्तराखंड राज्य किसान आयोग के प्रयासों से प्रदेश के कृषि क्षेत्र में एक बड़ा तकनीकी बदलाव देखने को मिल रहा है, जहां पारंपरिक खेती करने वाले किसान अब पूरी तरह डिजिटल और स्मार्ट बन गए हैं. आयोग द्वारा लगातार आधुनिक तकनीकों को बढ़ावा देने का ही यह सकारात्मक असर है कि राज्य के विभिन्न हिस्सों के किसान अपनी कृषि क्षमता और उपज में सुधार करने के लिए स्वेच्छा से नई तकनीकें अपना रहे हैं।
सबसे बड़ी राहत की बात यह है कि अब किसानों को अपनी समस्याओं के निवारण के लिए दफ्तरों के चक्कर नहीं काटने पड़ रहे हैं; वे सीधे व्हाट्सएप और ईमेल के माध्यम से अपनी शिकायतें और सुझाव आयोग के समक्ष रख रहे हैं. इस त्वरित और आधुनिक संचार व्यवस्था के कारण समस्याओं का तेजी से समाधान हो रहा है, जिससे किसानों का व्यवस्था पर भरोसा बढ़ा है।
तीन साल से रिक्त है आयोग में अध्यक्ष का पद
उत्तराखंड राज्य किसान आयोग अधिनियम, 2016 के तहत स्थापित इस आयोग का मुख्य कार्य प्रदेश के किसानों की स्थिति की समीक्षा करना, उनकी समस्याओं से सरकार को अवगत कराना और प्रशासन की मदद से उनका ठोस समाधान तलाशना है. हालांकि, प्रशासनिक स्तर पर एक बड़ी चुनौती यह बनी हुई है कि पिछले तीन वर्षों से आयोग में अध्यक्ष का महत्वपूर्ण पद पूरी तरह रिक्त चल रहा है, जिसके कारण कुछ हद तक आयोग का सुचारू कामकाज भी प्रभावित हो रहा है।
वर्तमान में आयोग की कमान उपाध्यक्ष अजीत चौधरी और सुरेंद्र सिंह नामधारी संभाल रहे हैं. उपाध्यक्ष अजीत चौधरी ने स्पष्ट रूप से कहा है कि आयोग किसानों की हर समस्या को दूर करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है और उनकी सहायता के लिए एक समर्पित मोबाइल नंबर 9758870000 तथा ईमेल आईडी [email protected] जारी की गई है, जिस पर किसान सीधे संपर्क स्थापित कर सकते हैं।
उपज को बड़ा बाजार दिलाना सबसे बड़ी चुनौती
उत्तराखंड के पर्वतीय और मैदानी क्षेत्रों के किसानों की सबसे बड़ी व्यावहारिक समस्या उनकी तैयार फसलों और कृषि उत्पादों को एक बड़ा तथा उचित बाजार दिलाना है, ताकि उन्हें अपनी मेहनत का सही मूल्य मिल सके. इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए किसान आयोग कृषि विशेषज्ञों की राय लेकर स्थानीय स्तर से लेकर बड़े औद्योगिक घरानों तक एक मजबूत सप्लाई चेन नेटवर्क स्थापित करने की योजनाओं पर काम कर रहा है।
इसी रणनीति के तहत पूर्व में एक सफल प्रयास करते हुए ITBP के जवानों के भोजन के लिए स्थानीय स्तर पर ही किसानों से सीधे फल और सब्जियों की खरीद को बड़े पैमाने पर बढ़ावा दिया गया था, जिससे किसानों की आर्थिक स्थिति में अभूतपूर्व सुधार दर्ज किया गया था।

