देहरादून। देश में भले ही एक पैसा, दो पैसा, पांच पैसा, दस पैसा, बीस पैसा और पच्चीस पैसे का सिक्का इतिहास बन चुका हो, लेकिन उत्तराखंड का संस्कृति विभाग आज भी शायद उसी दौर में सांस ले रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि आम आदमी के लिए यह पैसा कबाड़ हो चुका है, लेकिन सरकारी फाइलों में यही “50 पैसे” करोड़ों की ईमानदारी का सर्टिफिकेट बनकर घूम रहे हैं।
मामला राज्य स्थापना दिवस के दौरान आयोजित हुए “निनाद महोत्सव” से जुड़ा है, जहां संस्कृति विभाग ने नौ दिनों तक जनरेटर के जरिए कार्यक्रम स्थल पर बिजली सप्लाई करवाई। अब जरा सरकारी हिसाब-किताब का कमाल देखिए — नौ दिन तक धड़धड़ाता जनरेटर चला, सैकड़ों लीटर डीजल फूंका गया, रात-दिन रोशनी हुई, मंच चमके, स्पीकर गरजे, लेकिन पूरा बिजली खर्च आया महज 50 पैसे! जी हां, सुनने में भले यह किसी व्यंग्य नाटक का डायलॉग लगे, लेकिन यह खुलासा आरटीआई से सामने आए दस्तावेजों में दर्ज है। महंगाई के इस दौर में जहां एक रुपये में दुकानदार पॉलीथिन तक देने में आनाकानी करता है, वहां संस्कृति विभाग ने ऐसा जादुई जनरेटर खोज निकाला जो नौ दिन तक चलता रहा और खर्च आया सिर्फ आधा रुपया।
अब सवाल यह उठता है कि आखिर यह कौन सा दिव्य जनरेटर था? क्या उसमें डीजल की जगह गंगाजल डाला गया था? क्या वह सूर्य ऊर्जा से चलता था? या फिर विभाग ने वैज्ञानिकों से पहले ऐसा आविष्कार कर लिया जिसकी जानकारी दुनिया से छिपा ली गई?दिलचस्प बात तो यह है कि जहां जनरेटर का खर्च 50 पैसे दिखाया गया, वहीं जनरेटर से कार्यक्रम स्थल तक बिजली पहुंचाने के लिए खींची गई तार का बिल 9 लाख रुपये से ज्यादा बैठा दिया गया। यानी बिजली सस्ती नहीं थी, तार सोने-चांदी की थी! ऐसा लग रहा है मानो विभाग ने बिजली की सप्लाई नहीं बल्कि कार्यक्रम स्थल से सीधे स्वर्ग तक कनेक्शन खींच दिया हो।
सरकारी दस्तावेजों में दर्ज इस खेल ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर ऐसा कौन सा तकनीकी चमत्कार हुआ कि जनरेटर का खर्च नगण्य हो गया और तारों का खर्च आसमान छू गया? कहीं ऐसा तो नहीं कि सरकारी पैसों की तार सीधे किसी और जेब से जुड़ गई हो?
विडंबना देखिए, एक तरफ सरकार मंचों से पारदर्शिता, गुणवत्ता और ईमानदारी का पाठ पढ़ा रही है, दूसरी तरफ विभागीय सिस्टम सरकारी खजाने को ऐसे निचोड़ रहा है जैसे कोई पुरानी रस्सी से आखिरी बूंद निकालने की कोशिश कर रहा हो। फाइलों में सब कुछ इतना “साफ” दिखाया गया कि शक और गहरा हो गया। संस्कृति विभाग का यह कारनामा अब सचिवालय के गलियारों में भी चर्चा का विषय बना हुआ है। अफसरों के बीच सवाल उठ रहे हैं कि आखिर किस आधार पर यह भुगतान हुआ? किस अधिकारी ने बिल पास किए? किस तकनीकी अधिकारी ने इसे सही ठहराया? और सबसे बड़ा सवाल — क्या किसी ने कभी मौके पर जाकर यह देखने की जरूरत महसूस की कि आखिर 50 पैसे में कौन सा जनरेटर चल रहा है?
सूत्रों की मानें तो अगर इस पूरे मामले की गहराई से जांच हुई तो सिर्फ जनरेटर और तार का खेल ही नहीं, बल्कि कई और “संस्कृतिक चमत्कार” भी सामने आ सकते हैं। वर्षों से चल रहे भुगतान, ठेके और वेंडर चयन की परतें खुलीं तो कई बड़े नाम मुश्किल में आ सकते हैं। यहां तक कि कुछ अफसरों की पेंशन पर भी तलवार लटक सकती है। फिलहाल संस्कृति विभाग का यह “50 पैसे मॉडल” पूरे सरकारी सिस्टम पर बड़ा सवाल बनकर खड़ा है। जनता पूछ रही है कि जब आम आदमी बिजली के बिल भरते-भरते परेशान है, तब सरकारी विभागों में आखिर किस गणित से आधे रुपये में नौ दिन का जनरेटर चलाया जा रहा है? कहीं ऐसा तो नहीं कि संस्कृति बचाने के नाम पर सरकारी खजाने की “संस्कृति” ही बदल दी गई हो!

