यूपी में बाहुबली अतीक की हत्या पर वाह वाही तो उत्तराखंड में विनय की हत्या पर क्यों आंख भर आई ? गैंगस्टर की मौत पर विलाप क्यों….?

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देहरादून। उत्तर प्रदेश में बाहुबली नेता अतीक अहमद की हत्या के बाद उसे “दहशत का अंत” बताकर जिस तरह से चारों ओर राज्य सरकार की वाहवाही हुई, वही तस्वीर उत्तराखंड में बिल्कुल उलट नजर आ रही है। यहां कुख्यात अपराधी विनय त्यागी की हत्या के बाद कुछ वर्गों में ऐसा विलाप शुरू हो गया है, मानो किसी अपराधी की नहीं बल्कि किसी संत या महापुरुष की हत्या हो गई हो। इस पूरे घटनाक्रम के बाद कानून-व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करने की कोशिशें भी तेज हो गई हैं, जो अपने आप में कई सवाल खड़े करती हैं।
दरअसल, विनय त्यागी कोई साधारण व्यक्ति नहीं था। उसके खिलाफ हत्या, रंगदारी, गैंगवार और अन्य संगीन धाराओं में कई मुकदमे दर्ज थे। पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक वह लंबे समय से अपराध की दुनिया में सक्रिय था और उसके चलते कई परिवार उजड़े, कई लोगों की जिंदगी तबाह हुई। इसके बावजूद उसकी मौत के बाद जिस तरह से भावनात्मक माहौल बनाया जा रहा है, वह समाज और व्यवस्था दोनों के लिए चिंताजनक संकेत है।
घटना के अनुसार, विनय त्यागी को एक मामले में पेशी के लिए ले जाया जा रहा था। इसी दौरान उस पर जानलेवा हमला किया गया। गंभीर रूप से घायल अवस्था में उसे इलाज के लिए ऋषिकेश स्थित एम्स में भर्ती कराया गया, जहां डॉक्टरों की तमाम कोशिशों के बावजूद उसकी जान नहीं बच सकी। दो दिन तक चले इलाज के बाद उसकी मौत की पुष्टि होते ही यह मामला सुर्खियों में आ गया। उत्तराखंड सरकार पहले ही अपराधियों और माफियाओं के खिलाफ सख्त रुख अपना चुकी है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अगुवाई में सरकार लगातार यह संदेश दे रही है कि राज्य में अपराध और अपराधियों के लिए कोई जगह नहीं है। यही वजह है कि माफिया नेटवर्क से जुड़े लोगों में सरकार की इस नीति को लेकर बेचैनी साफ देखी जा रही है। अपराधियों पर नकेल कसने की कार्रवाई कई लोगों को रास नहीं आ रही है और उसी का नतीजा है कि हर बड़ी कार्रवाई या घटना के बाद कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े किए जाते हैं।
धामी सरकार के कार्यकाल में पुलिस और प्रशासन ने कई सख्त कदम उठाए हैं। अवैध संपत्तियों पर बुलडोजर चला है, गैंगस्टर एक्ट के तहत कार्रवाई हुई है और अपराधियों को उनके अंजाम तक पहुंचाने के लिए चाबुक लगातार चलाया जा रहा है। इस दौरान कुछ लोग अपराध की दुनिया से तौबा कर मुख्यधारा में लौटे हैं, तो कुछ पुलिस मुठभेड़ों में घायल हो गए । यह सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति का ही परिणाम है।
ताजा घटनाक्रम हरिद्वार से जुड़ा है, जहां दो दिन पहले विनय त्यागी पर हमला हुआ और आज उसकी एम्स में मौत हो गई। इस घटना के बाद सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट मोड पर हैं और पूरे मामले की जांच की जा रही है। लेकिन सवाल यह भी है कि जिसने खुद कई घर उजाड़े हों, कई मांगों को सूना किया हो, उसकी मौत पर इतना विलाप और आक्रोश आखिर क्यों?
किसी अपराधी की हत्या पर इस तरह का शोक और कानून-व्यवस्था को कठघरे में खड़ा करना किसी भी मायने में उचित नहीं कहा जा सकता। समाज को भी यह समझना होगा कि अपराध की दुनिया का अंत अक्सर इसी तरह होता है, और इसे महिमामंडित करना न तो सही है और न ही न्यायसंगत।

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