कच्ची पेंसिल से तैयार तबादला सूची कौन पहुंचाता है खबर नवीसो के पास ? या एक सप्ताह में तबादलो को लेकर फैलाया जा रहा भ्रम…

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देहरादून। उत्तराखंड में अधिकारियों के तबादलों की प्रक्रिया एक बार फिर सवालों के घेरे में है। आमतौर पर प्रशासनिक तबादलों को शासन-प्रशासन का आंतरिक विषय माना जाता है, लेकिन बीते कुछ समय से देहरादून में तबादलों से जुड़ी सूचनाएं इस तरह सार्वजनिक हो रही हैं, मानो यह कोई राष्ट्रीय स्तर की बड़ी खबर हो। खास बात यह है कि राज्य के कुछ चुनिंदा खबरनवीस लगातार यह दावा करते रहे हैं कि तबादलों की अंतिम सूची जारी होने से पहले ही उसकी “कच्ची पेंसिल” से तैयार प्रारंभिक रूपरेखा तक उनकी पहुंच होती है। अब एक बार फिर ऐसे ही कुछ एक खबरनवीसों द्वारा यह दावा किया जा रहा है कि अगले एक सप्ताह के भीतर राज्य में अधिकारियों की एक बड़ी तबादला सूची जारी होने जा रही है। यदि यह दावा सही साबित होता है, तो यह सीधे-सीधे शासन की गोपनीयता, प्रशासनिक मर्यादा और निर्णय प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़े करेगा।
प्रशासनिक व्यवस्था में तबादले एक संवेदनशील विषय होते हैं। इन पर चर्चा, मंथन और अनुमोदन की एक तय प्रक्रिया होती है। आमतौर पर अंतिम निर्णय से पहले सूचनाओं को पूरी तरह गोपनीय रखा जाता है, ताकि किसी तरह का दबाव, सिफारिश या बाहरी हस्तक्षेप न हो सके। ऐसे में यदि यह माना जाए कि तबादलों से पहले ही कुछ लोगों तक सूचनाएं पहुंच रही हैं, तो यह “सिस्टम लीकेज” की ओर इशारा करता है।
सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर वह कौन अधिकारी या कर्मचारी हैं, जिनके माध्यम से यह सूचनाएं बाहर जा रही हैं। क्या यह महज संयोग है कि कुछ खबरनवीसों के दावे बार-बार सही साबित होते नजर आते हैं, या फिर इसके पीछे शासन और विभागों के भीतर सक्रिय कोई ऐसा नेटवर्क है, जो गोपनीय सूचनाओं को चुनिंदा लोगों तक पहुंचा रहा है? यदि ऐसा है, तो यह न सिर्फ प्रशासनिक अनुशासन का उल्लंघन है, बल्कि राज्य की कार्यप्रणाली पर भी सवालिया निशान है।
खबरनवीसों का यह तक कहना है कि शासन में “पत्ता हिलने” से पहले ही उन्हें जानकारी मिल जाती है। यानी फाइलें चलने, नोटिंग होने या अनुमोदन की प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही संभावित तबादलों की सूची उनके पास होती है। यह दावा अपने आप में बेहद गंभीर है, क्योंकि इससे यह संकेत मिलता है कि निर्णय प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही सूचनाएं लीक हो रही हैं।
इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा पहलू यह भी है कि तबादलों को लेकर अनावश्यक अटकलें और चर्चाएं प्रशासनिक कामकाज को प्रभावित करती हैं। जिन अधिकारियों के नाम संभावित तबादला सूची में बताए जाते हैं, वे असमंजस की स्थिति में आ जाते हैं। कई बार इसका असर फील्ड में चल रहे कार्यों पर भी पड़ता है। वहीं, जिन अधिकारियों के नाम बार-बार चर्चा में आते हैं, वे खुद को असुरक्षित महसूस करने लगते हैं।
राज्य के जानकारों का मानना है कि यदि इस तरह की सूचनाएं लगातार बाहर आ रही हैं, तो शासन को इसकी गंभीरता से जांच करनी चाहिए। यह पता लगाया जाना जरूरी है कि सूचना कहां से और कैसे लीक हो रही है। साथ ही, यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि भविष्य में तबादलों जैसी संवेदनशील प्रक्रियाओं की गोपनीयता पूरी तरह बनी रहे।
फिलहाल, सबकी नजरें अगले एक सप्ताह पर टिकी हैं। यदि वास्तव में बड़ी तबादला सूची जारी होती है और खबरनवीसों के दावे सही साबित होते हैं, तो यह महज एक खबर नहीं होगी, बल्कि सिस्टम के भीतर मौजूद कमजोरियों का खुला प्रमाण मानी जाएगी। ऐसे में शासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह न सिर्फ तबादलों को पारदर्शी बनाए, बल्कि गोपनीयता भंग करने वाले तंत्र पर भी सख्त कार्रवाई करे, ताकि प्रशासनिक विश्वास बहाल रह सके।