देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति एक बार फिर ऑडियो विवाद के चलते हलचल में है। उर्मिला सनावर और सुरेश राठौड़ से जुड़े एक के बाद एक सामने आ रहे कथित ऑडियो ने राजनीतिक माहौल को गर्मा दिया है। इन ऑडियो में भाजपा के प्रदेश प्रभारी दुष्यंत गौतम का नाम बार-बार उछलना कई सवाल खड़े कर रहा है। पूरे घटनाक्रम को देखकर यह किसी राजनीतिक साजिश से कम नहीं लग रहा, बल्कि कई लोगों की नजर में यह मामला किसी फिल्मी कहानी से भी आगे प्रतीत हो रहा है।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यदि यह प्रकरण वास्तविक है तो फिर यह सवाल लाजिमी है कि जब अंकिता भंडारी हत्याकांड की शुरुआत हुई थी, उस समय यह कथित किरदार और दावे सामने क्यों नहीं आए। उस वक्त राज्यभर में जनआक्रोश चरम पर था और तमाम राजनीतिक संगठन सड़कों पर उतरकर न्याय की मांग कर रहे थे। स्वयं मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में सरकार भी इस मामले को गंभीरता से लेते हुए दोषियों को सलाखों के पीछे पहुंचाने में जुटी हुई थी। ऐसे संवेदनशील समय में अगर कोई ठोस जानकारी या साक्ष्य थे, तो उनका सामने न आना आज संदेह को और गहरा करता है।
अब जबकि ऑडियो सामने आ रहे हैं और वीआईपी नामों को उछालकर राजनीतिक बयानबाज़ी तेज की जा रही है, तो सवाल यह भी उठता है कि क्या यह सच में किसी छिपे हुए सच का खुलासा है या फिर जानबूझकर प्रदेश के राजनीतिक और सामाजिक माहौल को खराब करने की कोशिश।
विशेषज्ञों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस पूरे प्रकरण में किसी तीसरे खेमें की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। संभव है कि कोई ऐसा समूह हो जो पुराने मामलों को दोबारा उछालकर राजनीतिक लाभ लेना चाहता हो या फिर राज्य की छवि को धूमिल करने की साजिश रच रहा हो। जिस तरह से समय-समय पर ऑडियो सामने आ रहे हैं, वह पूरे मामले को प्लांटेड होने की ओर इशारा करता है।
कानूनी जानकारों के अनुसार, ऐसे मामलों में सबसे जरूरी है निष्पक्ष और गहन जांच। ऑडियो की फॉरेंसिक जांच, उनके स्रोत और समय की पड़ताल के बिना किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। जांच के बाद ही यह साफ हो पाएगा कि यह मामला सच्चाई पर आधारित है या फिर राजनीतिक चाल का हिस्सा।
फिलहाल, यह विवाद उत्तराखंड की राजनीति में एक नए तनाव का कारण बन गया है। जनता भी असमंजस में है कि आखिर सच्चाई क्या है। अब सबकी निगाहें जांच और राजनीतिक दलों की अगली रणनीति पर टिकी हैं, जो यह तय करेगी कि यह मामला हकीकत है या फिर प्रदेश की राजनीति में एक और सुनियोजित पटकथा।


