उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों अंकिता भंडारी हत्याकांड, अवैध अतिक्रमण पर कार्रवाई और 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर पहले ही सियासी घमासान मचा हुआ है और अब उत्तराखंड को विश्व की आध्यात्मिक राजधानी बनाने के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ऐलान पर उत्तराखंड की राजनीति में पक्ष-विपक्ष के सुर बिगड़ चुके हैं। दरअसल, राज्य स्थापना दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐलान किया था कि उत्तराखंड की प्राचीन धार्मिक परंपराओं, चारधाम, योग–ध्यान और सनातन संस्कृति को वैश्विक मंच पर स्थापित किया जाएगा। वहीं उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में राज्य सरकार इसकी दिशा में ठोस रणनीति पर कार्य कर रही है, जिसे लेकर राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि दून विश्वविद्यालय में Centre for Hindu Studies की स्थापना, सांस्कृतिक शोध, आध्यात्मिक परिसरों का विकास और ग्लोबल स्पिरिचुअल टूरिज्म को बढ़ावा देकर उत्तराखंड को दुनिया की आध्यात्मिक राजधानी बनाया जाएगा, लेकिन अब विपक्ष ने इस ऐलान पर अपना प्रश्नचिह्न लगाकर इस विषय से प्रदेश राजनीति को और सुलगा दिया है।
आध्यात्मिक राजधानी पर मचा सियासी घमासान
जहां एक ओर भाजपा इस संकल्प को आध्यात्मिक राजधानी बनाने के लिए प्रतिबद्धता से सिद्घ किए जाने की बात कहती है तो वहीं विपक्षी दल कांग्रेस ने इसा दिखावा करार दिया है। भाजपा प्रदेश प्रवक्ता हनी पाठक ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस आध्यात्मिक राजधानी की बात करी है उसकी दिशा में लगातार काम हो रहा है। यूं ही उत्तराखंड को देवभूमि नहीं कहा जाता, लिहाजा राज्य सरकार भी अवैध अतिक्रमण हटाने से लेकर सनातन मूल्यों को मजबूत करने तक गंभीर है। वहीं उत्तराखंड के विद्यालयों में गीता का पाठ्यक्रम लागू करना भी इसी दिशा की ओर एक अहम कदम है,मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी लगातार इस संकल्प को धरातल पर उतार रहे हैं।
वहीं कांग्रेस ने इसे सरकार का प्रचार और दिखावा करार देते हुए कहा कि उत्तराखंड को किसी भी प्रमाण पत्र की आवश्यक्ता नहीं है, देवभूमि आदिकाल से ही आध्यात्मिक भूमि रही है। कांग्रेस की प्रदेश प्रवक्ता प्रवक्ता गरिमा दसौनी का कहना है कि उत्तराखंड पहले से ही आध्यात्मिक प्रदेश है। चारधाम, हेमकुंड साहिब, हरिद्वार, गंगा–यमुना की विरासत किसी सरकार की देन नहीं है, नाम बदलने और घोषणाओं से कुछ नहीं होगा, स्मार्ट सिटी की तरह आध्यात्मिक राजधानी भी सिर्फ पैसा खर्च करने और जेबें भरने का जरिया बन जाएगी, जरूरत व्यवस्थाओं को सुधारने की है, ना कि नए-नए टैग देने की।


