देहरादून। राजधानी देहरादून में स्वास्थ्य व्यवस्था का हाल इन दिनों ऐसा हो चला है कि मरीज इलाज कम और चक्कर ज्यादा काट रहे हैं। ताजा मामला एंटी रैबीज इंजेक्शन की किल्लत का है, जहां जरूरतमंद लोग अस्पताल से अस्पताल भटकने को मजबूर हैं। करोड़ों के बजट और बड़े-बड़े दावों के बीच अब यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर यह पैसा जाता कहां है?
हर साल सरकार एंटी रैबीज इंजेक्शन के लिए मोटा बजट तय करती है, योजनाएं बनती हैं, फाइलें दौड़ती हैं और कागजों में सब कुछ दुरुस्त दिखता है। लेकिन जैसे ही कोई मरीज हकीकत में अस्पताल पहुंचता है, उसे पता चलता है कि सिस्टम तो कागजों में ही ‘स्वस्थ’ है, जमीन पर तो खुद आईसीयू में है। राजधानी के जिला अस्पताल कोरोनेशन की तस्वीर तो और भी डरावनी है। यहां पहुंचे कई मरीजों को एंटी रैबीज इंजेक्शन नहीं मिला। अब इलाज के बजाय उन्हें सलाह मिली—“यहां नहीं है, आप दून अस्पताल चले जाइए।” यानी मरीज का इलाज कम, ‘रेफरल टूर’ ज्यादा जरूरी हो गया है। सवाल यह है कि क्या अब सरकारी अस्पतालों का काम मरीजों का इलाज करना नहीं, बल्कि उन्हें एक-दूसरे के पास भेजना रह गया है?
हैरान की बात तो यह है कि सिस्टम हमेशा अपने पुराने फार्मूले पर ही चलता नजर आता है—पहले लापरवाही, फिर फजीहत, और उसके बाद व्यवस्थाओं का इंतजाम। जब तक मामला सोशल मीडिया या जनाक्रोश का रूप न ले ले, तब तक जिम्मेदारों को शायद ‘अलर्ट मोड’ ऑन करने की जरूरत ही महसूस नहीं होती।
मुफ्त इलाज और मुफ्त दवाओं के दावे अब ऐसे लगते हैं जैसे किसी पुराने चुनावी भाषण की यादें हों। जमीनी हकीकत यह है कि मरीज सरकारी अस्पताल पहुंचता है तो उसे दवा नहीं मिलती, इंजेक्शन नहीं मिलता और अंत में सलाह मिलती है—“बाहर से ले लीजिए।” यानी मुफ्त इलाज का सपना, जेब पर बोझ बनकर टूट जाता है।
सबसे ज्यादा मुश्किल उन लोगों की है, जो निजी अस्पतालों का खर्च नहीं उठा सकते। उनके लिए सरकारी अस्पताल ही आखिरी उम्मीद होते हैं, लेकिन जब वहीं से खाली हाथ लौटना पड़े तो उम्मीद भी दम तोड़ने लगती है।
सिस्टम की खामोशी भी कम दिलचस्प नहीं है। जिम्मेदार अधिकारी एक-दूसरे की तरफ इशारा कर अपनी जिम्मेदारी से बचते नजर आते हैं। कोई सप्लाई पर सवाल उठाता है, कोई बजट पर, तो कोई प्रक्रिया पर—लेकिन मरीज के जख्म और खतरे पर किसी की नजर नहीं जाती।
अब सवाल सीधा है—क्या देहरादून की स्वास्थ्य व्यवस्था किसी ‘जादू की छड़ी’ का इंतजार कर रही है? या फिर यह मान लिया गया है कि जब तक हालात पूरी तरह बिगड़ न जाएं, तब तक सुधार की गुंजाइश ही नहीं?
फिलहाल, सच्चाई यही है कि राजधानी में एंटी रैबीज इंजेक्शन नहीं, बल्कि ‘भटकाव’ आसानी से उपलब्ध है। मरीज इलाज की उम्मीद लेकर आता है, और सिस्टम उसे ‘दौड़’ का अनुभव देकर विदा कर देता है।
स्वास्थ्य विभाग.. हमसे ना हो पाएगा……बीमार सिस्टम, बेहाल मरीज—देहरादून की असली हेल्थ रिपोर्ट… कहां गए इंजेक्शन…?
ADVERTISEMENTS

