उत्तराखंड के शिक्षा विभाग में फर्जी दिव्यांगता प्रमाण पत्र के जरिए शिक्षक बनने वालों के खिलाफ सरकार अब कड़ा रुख अपनाने जा रही है। स्वास्थ्य विभाग ने एम्स ऋषिकेश के माध्यम से कुल 750 शिक्षकों के प्रमाण पत्रों और स्वास्थ्य की गहन जांच पूरी कर ली है। जांच रिपोर्ट में कई शिक्षकों के प्रमाण पत्र फर्जी पाए जाने की पुष्टि हुई है। माध्यमिक शिक्षा निदेशक डॉ. मुकुल कुमार सती ने सभी मुख्य शिक्षा अधिकारियों को निर्देश दिए थे कि राज्य गठन के बाद से दिव्यांग कोटे में नियुक्त सभी प्रवक्ताओं और शिक्षकों का स्वास्थ्य परीक्षण अनिवार्य रूप से किया जाए। विभाग अब इन शिक्षकों के खिलाफ एकतरफा कानूनी कार्रवाई और सेवा समाप्ति की तैयारी कर रहा है।
हाईकोर्ट की दखल के बाद हुई सख्त कार्रवाई
यह मामला तब तूल पकड़ा जब ‘नेशनल फेडरेशन ऑफ द ब्लाइंड’ की ओर से हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल की गई। याचिका में आरोप लगाया गया था कि कई लोग बिना किसी दिव्यांगता के फर्जी सर्टिफिकेट बनवाकर इस कोटे का गलत लाभ उठा रहे हैं। हालांकि 2022 में भी कुछ जांचें हुई थीं, लेकिन तब कोई बड़ी कार्रवाई नहीं की गई थी। अब नए सिरे से प्रवक्ताओं और एलटी शिक्षकों की जांच कराई गई है।
एम्स ऋषिकेश में चली लंबी जांच प्रक्रिया
स्वास्थ्य विभाग के नेतृत्व में यह विशेष जांच अभियान 7 मार्च से 2 अप्रैल तक एम्स ऋषिकेश में चलाया गया। सीएमओ देहरादून डॉ. मनोज शर्मा के मुताबिक, शिक्षकों की दिव्यांगता की असलियत परखने के लिए मेडिकल बोर्ड का गठन किया गया था। इस प्रक्रिया में उन शिक्षकों को भी रडार पर लिया गया जिन्होंने स्वास्थ्य परीक्षण से बचने की कोशिश की थी।
जल्द सौंपी जाएगी अंतिम रिपोर्ट
स्वास्थ्य महानिदेशक डॉ. सुनीता टम्टा ने स्पष्ट किया है कि 750 शिक्षकों की जांच रिपोर्ट अब संकलित की जा रही है। इस रिपोर्ट की एक प्रति बहुत जल्द शिक्षा निदेशालय को सौंप दी जाएगी। रिपोर्ट मिलते ही विभाग फर्जी पाए गए शिक्षकों को नोटिस जारी करेगा और उनके खिलाफ कड़ी प्रशासनिक व कानूनी कार्रवाई शुरू की जाएगी।
अधिकारियों को सख्त निर्देश
शिक्षा विभाग ने साफ कर दिया है कि जो शिक्षक स्वास्थ्य परीक्षण के लिए उपस्थित नहीं हुए हैं, उन्हें दोषी मानते हुए उन पर तत्काल कार्रवाई की जाएगी। विभाग का लक्ष्य पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया सुनिश्चित करना और उन लोगों को बाहर करना है जिन्होंने पात्र उम्मीदवारों का हक छीना है।

