हिमालय पर दोहरा संकट: अब जमीन के भीतर की गर्मी से भी पिघल रहे ग्लेशियर, शोध में हुआ बड़ा खुलासा

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हिमालय के उच्च क्षेत्रों में स्थित ग्लेशियरों पर जलवायु परिवर्तन की मार अब और भी घातक होती जा रही है। वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान के ताजा अध्ययन के अनुसार, न केवल बढ़ता वैश्विक तापमान ग्लेशियरों की ऊपरी परत को पिघला रहा है, बल्कि जमीन के भीतर की ‘भूतापीय गर्मी’ (Geothermal Heat) भी इनके अंदरूनी हिस्सों को नुकसान पहुँचा रही है। लद्दाख क्षेत्र के चार प्रमुख ग्लेशियरों पर किए गए इस शोध ने वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है, क्योंकि ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार बनने वाली बर्फ की तुलना में कहीं अधिक तेज हो गई है।

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लगातार पीछे खिसक रहे लद्दाख के ग्लेशियर

शोध के अनुसार, पिछले तीन दशकों में लद्दाख क्षेत्र के ग्लेशियर तेजी से पीछे हटे हैं। आंकड़ों की बात करें तो ‘डरंग डांग’ ग्लेशियर करीब 166 मीटर और ‘पेन्सिलुंगपा’ ग्लेशियर लगभग 80 मीटर पीछे खिसक चुके हैं। सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा ‘पद्म’ ग्लेशियर का है, जो करीब 784 मीटर पीछे हट गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्लेशियरों का ‘मास बैलेंस’ यानी बर्फ का संतुलन बिगड़ गया है, जो इनके भविष्य के लिए एक बड़ा खतरा है।

बढ़ रहा झीलों का आकार और आपदा का डर

ग्लेशियरों के पिघलने से हिमालयी क्षेत्रों में झीलों की संख्या और उनके क्षेत्रफल में भारी बढ़ोतरी देखी जा रही है। उदाहरण के लिए, पद्म ग्लेशियर के पास बनी झील का क्षेत्रफल 0.35 वर्ग किमी से बढ़कर 0.56 वर्ग किमी हो गया है। उत्तराखंड के चमोली और उत्तरकाशी जैसे जिलों में 4500 मीटर से अधिक ऊंचाई पर स्थित झीलों का आकार लगातार बढ़ रहा है। यह स्थिति भविष्य में ‘ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड’ (GLOF) यानी झील फटने जैसी भयानक आपदाओं को जन्म दे सकती है, जिससे निचले इलाकों में भारी तबाही का खतरा है।

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वैज्ञानिकों की चेतावनी: सावधान रहने की जरूरत

संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिकों का कहना है कि एयरोसोल, माइक्रो प्लास्टिक प्रदूषण और कम बर्फबारी जैसे कारकों ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। साल 2023 और 2024 के दौरान 4800 से 5000 मीटर की ऊंचाई पर सबसे अधिक पिघलाव दर्ज किया गया। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यदि ग्लेशियर इसी रफ्तार से पिघलते रहे, तो आने वाले समय में पानी की उपलब्धता और अचानक आने वाली बाढ़ जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।