आप अपने बच्चे को मोबाइल देकर उसका मनोरंजन नहीं कर रहे हो उसको बीमार बना रहे हो। देखा जा रहा है कि मां अपने काम निपटाने के चक्कर में बच्चे को मोबाइल थमा रही है बच्चा उसकी जादूई स्क्रीन के लाल-पीले रंग में उलझ कर खुद को भूल रहा है। इतना तक देखा जा रहा है कि बच्चे किसी चीज की जिद कर रहे हैं तो मम्मी-पापा उसे समझा नहीं रहे है बल्कि मोबाइल के नाम पर ब्लैकमेल कर रहे हैं।
अब तो ये भी होने लगा है कि अगर बच्चे से अभिभावकों को कोई काम करवाना है तो बच्चा उसकी एवज में उनका मोबाइल मांग रहा है, ताकि मनपसंद कार्टून देखे जाएं या फिर अपनी पसंद का गेम खेला जाए। अब नई नस्ल खेल मैदान में नहीं बल्कि मोबाइल में गेम खेलने की आदी हो रही है। बच्चो की इस आदत से बेशक मां-बाप बेफिक्र हों लेकिन सेहत के जानकार डॉक्टर्स के माथे पर शिकन की लकीरें उभर आई हैं।
दरअसल मोबाइल और टीवी स्क्रीन के साथ ज्यादा वक्त गुजार रहे बच्चों मे कई शारिरिक और मानसिक विकृतियां पनप रही है। मोबाइल को अपना सच्चा साथी मान चुके मासूम धीरे-धीरे वर्चुअल ऑटिज्म की ओर सरक रहे हैं। मतलब अपनो के साथ रहकर भी उनसे कटता चला जा रहा है। ज्यादा स्क्रीन टाइम के चलते बच्चों में ऑटिज्म बीमारी के लक्षण पनप रहे हैं। लखनऊ के किग्स जॉर्ज मेडिकल कॉलेज की ओपीडी में बीते एक साल में तीन से दस साल तक के 100 बच्चों में इस बीमारी की पुष्टि हो चुकी है। जिनमें 40 बच्चों को ऑटिज्म और 60 बच्चों को वर्चुअल ऑटिज्म की बीमारी ने घेर लिया है।
चिंताजनक बात ये है कि इस ग्राफ में लगातार इजाफा हो रहा है। कानपुर, गोरखपुर,आगरा वाराणसी प्रयागराज और बरेली जैसे तमाम मंडलो में ऑटिज्म के शिकार बच्चों की तादाद बढ़ रही है। यूपी के इन मंडलो में साढे पंद्रह हजार से ज्यादा बच्चे ऑटिज्म बीमारी की चपेट में हैं जिनका इलाज चल रहा है मोबाइल स्क्रीन मासूमों को स्वस्थ मनोरंजन नहीं बल्कि चिड़चिडापन, एकाग्रता की कमी और असामान्य व्यवहार जैसी बीमारी दे रहा है। लिहाजा संजीदा हो जाइए, बच्चो को मोबाइल नहीं सेहत दीजिए।

