देहरादून, उत्तराखंड की राजनीति एक बार फिर उबाल पर है। सुरेश राठौड़ और उर्मिला सनावर के बीच हुई कथित आपसी बातचीत की रिकॉर्डिंग के वायरल होने के बाद राज्य का राजनीतिक माहौल बेहद तनावपूर्ण हो गया है। यह बातचीत सीधे तौर पर अंकिता भंडारी हत्याकांड से जुड़ी बताई जा रही है, जिस कारण यह मामला केवल राजनीतिक गलियारों तक सीमित न रहकर जनभावनाओं से भी गहराई से जुड़ गया है। सोशल मीडिया और राजनीतिक मंचों पर इस ऑडियो को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं, वहीं सरकार और प्रशासन पर भी सवाल खड़े किए जा रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह बातचीत किसी सुनियोजित राजनीतिक रणनीति का हिस्सा साबित होती है, तो यह सवाल और भी गंभीर हो जाता है कि इतने बड़े जनसमूह की भावनाएं, आखिर किस दिशा में मोड़ी जा रही हैं। अंकिता भंडारी हत्याकांड पहले ही प्रदेश में संवेदनशील मुद्दा रहा है और अब इस कथित ऑडियो के सामने आने से मामले ने एक नया मोड़ ले लिया है। जानकारों कहना है कि यह सब राजनीतिक लाभ के लिए किया गया प्रयास मान रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम में एक अहम सवाल यह भी उठ रहा है कि यदि भविष्य में उर्मिला सनावर के बयान या रुख में बदलाव आता है, तो राज्य का माहौल किस ओर जाएगा। पहले भी इनके आपसी बातचीत के कथित ऑडियो सामने आते रहे है जिस पर कभी किसी ने ध्यान नहीं दिया लेकिन जानकारो का मानना है कि इस बार ध्यान आकर्षित करने के लिए हो सकता है यह हथकंडा अपनाया गया हो, इस बार आरोपों को इस तरह से पेश किया गया कि वे किसी ठोस निष्कर्ष तक नहीं पहुंच पाए। अब नए ऑडियो ने उन पुराने विवादों को फिर से ताजा कर दिया है और राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है।
पुलिस और प्रशासन की भूमिका भी इस मामले में चर्चा का विषय बनी हुई है। जिन लोगों पर यह ऑडियो वायरल करने का आरोप है, वे फिलहाल फरार बताए जा रहे हैं। पुलिस उनकी गिरफ्तारी के लिए लगातार दबिश दे रही है और अधिकारियों का कहना है कि मामले की निष्पक्ष जांच की जाएगी। प्रशासन यह स्पष्ट करने की कोशिश कर रहा है कि किसी भी तरह की अफवाह या भ्रामक जानकारी से जनता को गुमराह न किया जाए।
वहीं, इस ऑडियो के आधार पर पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा करने वालों से यह सवाल भी पूछा जा रहा है कि वे इस तथ्य को कैसे नजरअंदाज कर सकते हैं कि राज्य की धामी सरकार ने ही अंकिता भंडारी मामले में आरोपियों को सजा दिलवाने के लिए पुरजोर प्रयास किए। सरकार का दावा है कि जांच से लेकर न्यायिक प्रक्रिया तक किसी भी स्तर पर कोई समझौता नहीं किया गया और दोषियों को कानून के दायरे में लाया गया।
कुल मिलाकर, यह पूरा मामला न केवल राजनीतिक बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी संवेदनशील बन चुका है। आने वाले दिनों में जांच की दिशा, आरोपियों की गिरफ्तारी और संबंधित लोगों के बयानों पर ही यह तय होगा कि यह विवाद शांत होगा या राज्य की राजनीति में और उथल-पुथल मचाएगा।


