हरक के ‘चेलों’ की लंबी फेहरिस्त ! धन सिंह से तीरथ तक पर जता दिया अपना सियासी हक… सुनिए क्या कहा…

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देहरादून। पूर्व कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत के ताजा बयान ने उत्तराखंड की सियासत में एक बार फिर हलचल पैदा कर दी है। सवाल भले ही उनके लगातार दल बदलने को लेकर था, लेकिन जवाब में उनकी सियासी महत्वाकांक्षाओं, पुराने रिश्तों और सत्ता के गलियारों से दूरी का दर्द कुछ इस तरह सामने आया कि सुनने वाले भी सोचने पर मजबूर हो गए।

हरक सिंह रावत से जब पूछा गया कि भाजपा, कांग्रेस, भाजपा और बसपा समेत कई राजनीतिक दलों में भूमिका निभाने के बाद आखिर जनता उन पर भरोसा क्यों करे, तो पहले उन्होंने सवाल का सीधा जवाब देने से परहेज किया। लेकिन जब बोले तो जवाब ने कई नए सवाल जरूर खड़े कर दिए।

हरक सिंह रावत ने अपने राजनीतिक सफर और प्रभाव का जिक्र करते हुए मौजूदा सरकार में मंत्री धन सिंह रावत से लेकर पूर्व मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत और नए नवेले मंत्री राम सिंह कैड़ा तक को अपना राजनीतिक ‘चेला’ बता दिया। इतना ही नहीं, उन्होंने अपनी राजनीतिक जीत का बखान करते हुए सरकार में मंत्री भरत चौधरी को भी चुनाव में हराने का दावा कर डाला। यानी सवाल था भरोसे का, लेकिन जवाब पहुंच गया सियासी कद, पुराने रिश्तों और चुनावी जीत के किस्सों तक।

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यही वजह है कि हरक सिंह रावत का यह बयान अब सियासी गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है। सवाल उठ रहा है कि आखिरकार सत्ता से दूरी ने उन्हें पुराने चेले याद दिला दिए हैं या फिर लंबे राजनीतिक करियर के बावजूद वह मुकाम हासिल नहीं हो पाया, जिसकी टीस आज भी उनके भीतर कहीं मौजूद है?

हरक सिंह रावत उत्तराखंड की राजनीति का ऐसा नाम हैं, जिनकी सियासी यात्रा हमेशा चर्चा में रही है। दल बदलने से लेकर सत्ता के शीर्ष पदों तक पहुंचने की कोशिशों तक, उनके राजनीतिक सफर में कई उतार-चढ़ाव आए। कभी वह भाजपा के साथ रहे तो कभी कांग्रेस का दामन थामा और राजनीतिक परिस्थितियों के मुताबिक उनकी भूमिका भी बदलती रही।

यही वजह है कि जब उनसे ‘दल बदलू’ होने को लेकर सवाल पूछा गया तो सवाल महज राजनीतिक दल बदलने का नहीं था, बल्कि उस भरोसे का था जो जनता किसी नेता के साथ जोड़ती है। लेकिन हरक सिंह रावत का जवाब इस मूल सवाल से अलग दिशा में चला गया। उन्होंने यह बताने की कोशिश की कि उत्तराखंड की राजनीति में उनका प्रभाव कितना रहा है और किस-किस नेता के राजनीतिक सफर में उनकी भूमिका रही।

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यहां तक कि उन्होंने अपने से जुड़े नेताओं को ‘चेला’ बताकर अपने राजनीतिक कद का एहसास कराने की कोशिश की। हालांकि सियासत में पुराने रिश्तों का हवाला देना कोई नई बात नहीं है, लेकिन सवाल यह है कि क्या वर्तमान राजनीति में पुराने प्रभाव और पुराने रिश्ते ही पर्याप्त हैं?

जनता के बीच किसी नेता की स्वीकार्यता सिर्फ इस बात से तय नहीं होती कि उसने किसे राजनीति सिखाई या किस चुनाव में किसे हराया। असली कसौटी यह है कि नेता आज किस मुद्दे पर जनता के बीच खड़ा है और उसके राजनीतिक फैसलों पर लोग कितना भरोसा करते हैं।

हरक सिंह रावत के बयान का एक दूसरा पहलू भी है। जिस अंदाज में उन्होंने अपने राजनीतिक प्रभाव और पुराने रिश्तों को गिनाया, उससे ऐसा जरूर लगा कि उनके भीतर आज भी बड़ा राजनीतिक रोल निभाने की इच्छा कहीं न कहीं जिंदा है। सत्ता से बाहर होने के बावजूद सत्ता के गलियारों की चर्चा और पुराने राजनीतिक कद का हवाला शायद इसी बेचैनी की तरफ इशारा करता है।

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अब सवाल यह है कि क्या हरक सिंह रावत अपने लंबे राजनीतिक अनुभव के सहारे उत्तराखंड की सियासत में फिर कोई बड़ी भूमिका तलाश रहे हैं? क्या पुराने चेले और पुराने सियासी किस्से उनके लिए सिर्फ अतीत हैं या आने वाली राजनीति की भूमिका?

फिलहाल इतना जरूर है कि सवाल किसी और मुद्दे पर था, लेकिन हरक सिंह रावत का जवाब उनकी सियासी कहानी के कई पन्ने खोल गया। बयान ने यह बहस जरूर छेड़ दी है कि हरक को आज भी सत्ता की कुर्सी का इंतजार है या फिर उनके भीतर उस मुकाम को लेकर कसक बाकी है, जिसे वह अपने लंबे राजनीतिक सफर में हासिल नहीं कर सके।

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