विक्रम शर्मा हत्या कांड…. सवालों में अमृत स्टोन क्रेशर, पांच साल की इजाजत, सालों की सियासत,2013 में मिला था लाइसेंस…

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लाइसेंस की तारीखें बोलती हैं, बयानबाजी क्यों डोलती है?

बीते रोज गैंगस्टर विक्रम शर्मा मर्डर केस के बाद उसके कथित खनन कारोबार से जुड़े तारों को लेकर प्रदेश की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। खास तौर पर अमृत स्टोन क्रेशर को जारी लाइसेंस लेकर कई तरह के सवाल उठाए जा रहे हैं। विपक्ष और कुछ संगठनों की ओर से सरकार पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि खनन कारोबार में कथित रूप से आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को संरक्षण मिला। हालांकि दस्तावेजी तथ्यों की पड़ताल एक अलग तस्वीर सामने लाती है। जानकारी के अनुसार अमृत स्टोन क्रेशर को प्रारंभिक अनुमति 16 सितंबर 2013 को दी गई थी। उस समय राज्य में कांग्रेस की सरकार थी और खनन एवं उद्योग से संबंधित नीतियों के तहत पांच वर्ष की अवधि के लिए लाइसेंस स्वीकृत किया गया था। इसके बाद निर्धारित प्रक्रिया के तहत लाइसेंस का समय-समय पर नवीनीकरण होता रहा। यह नवीनीकरण संबंधित विभागीय मानकों और औपचारिकताओं के आधार पर किया गया या नहीं, यह जांच का विषय हो सकता है, लेकिन मूल स्वीकृति पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल में दी गई थी।
विक्रम शर्मा की आपराधिक पृष्ठभूमि और खनन व्यवसाय के बीच संभावित संबंधों को लेकर जांच एजेंसियां अपना काम कर रही हैं। ऐसे में बिना पूरी जांच के यह निष्कर्ष निकाल लेना कि वर्तमान सरकार ने खनन माफियाओं को बढ़ावा दिया, राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का हिस्सा अधिक प्रतीत होता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी आपराधिक मामले को सीधे तौर पर सरकारी नीति से जोड़ना सावधानी की मांग करता है। यदि किसी लाइसेंसधारी के खिलाफ गंभीर आरोप या आपराधिक रिकॉर्ड सामने आता है तो संबंधित विभागों को नियमानुसार कार्रवाई करनी चाहिए। लेकिन केवल आरोपों के आधार पर यह कहना कि सरकार खनन कारोबार में माफियाओं को संरक्षण दे रही है, तथ्यात्मक जांच के बिना उचित नहीं माना जा सकता।
फिलहाल मर्डर केस की जांच जारी है और खनन व्यवसाय से जुड़े पहलुओं की भी पड़ताल की जा रही है। आने वाले दिनों में जांच रिपोर्ट से ही स्पष्ट होगा कि लाइसेंस प्रक्रिया में कहीं कोई अनियमितता थी या नहीं।