उत्तराखंड में तकरीबन सभी विभागों में हजारों की तादाद में उपनल कर्मचारी तैनात हैं। सालों साल से ये मुलाजिम महकमें की बढ़िया वाली स्टेफनी बनकर काम दे रहे हैं। बिजली हो या पानी, स्वास्थ्य सेवा हो या खेती किसानी का महकमा हर दफ्तर उपनल कर्मचारियों के भरोंसे चल रहा है। नियमितिकरण को लेकर उपनलकर्मचारी कई बार सड़कों पर उतरे हर बार सरकारी आश्वसन की डोज इन्हें मिलती रही लेकिन ऐसा हो नहीं पाया।
अब बीते दिनो सरकार ने उपनल कर्मचारियों के लिए एक अनुबंध तैयार किया है जिसकी शर्ते उपनल कर्मियों को रास नहीं आ रही है। उन्हें लग रहा है कि उनके साथ ठगी हुई है। बहरहाल अनुबंध की शर्तों से खफा उपनल कर्मचारी संघ के पदाधिकारी सूबे के कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल से मिले और अपनी आपबीती सुनाई। उपनल कर्मचारियों का कहना है कि सरकार का जारी अनुबंध अदालत के आदेशों की अवमानना है। हालांकि कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल ने फिर भरोंसा दिलाया है कि कोई न कोई रास्ता जरूर निकाला जाएगा।
गौरतलब है कि संविदा कर्मचारी पक्की नौकरी और समान काम के लिए समान वेतन की मांग को लेकर अदालत में भी गए थे जहां उनके हक में माननीय उच्च न्यायालय ने फैसला भी सुनाया था। जिसके बाद राज्य सरकार ने एक समिति बनाकर रास्ता निकालने की पहल भी की थी . हालांकि अब उपनल कर्मचारियों के सामने अनुबंध रखा गया है जिसमे पक्की नौकरी का कोई सीन ही नहीं है।
बहरहाल उपनल कर्मचारियों को इसका भी ख्याल रखना होगा कि अभी बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट केरल हाईकोर्ट के फैसले को पलट चुका है। जिसमें सविदा पर तैनात विश्वविद्यालय शिक्षक नियमितिकरण और समान काम समान वेतन की मांग को सुप्रीम कोर्ट ने मानने से इंकार कर दिया था। न्यायालय ने दो टूक कहा था कि संविदा पर तैनाती की कार्य प्रकृति और जिम्मेदारी नियमित शिक्षकों से अलग होती है लिहाजा वे न तो पक्की नौकरी की मांग कर सकते हैं और न नियमितिकरण की । ऐसे में माना जा रहा है कि उत्तराखंड सरकार ऐसा रास्ता तलाश रही है जिससे सांप भी मर जाए और लाठी भी सही सलामत रहे। कहने वाले कह रहे हैं कि सरकार उपनल कर्मियों को टरकाते-टरकाते इतना मजबूर कर सकती है कि मामला सुप्रीम कोर्ट में चला जाए और केरल सरकार को दिए फैसले का एडवांटेज उत्तराखंड सरकार को भी मिल जाए।
चर्चा ये भी है कि ज्यादातर उपनल कर्मी न तो किसी प्रतियोगिता परीक्षा के मार्फत नहीं चुने गए हैं और न वे उपनल के तय किए गए मानको को पूरा करते हैं। सूत्रों की माने तो सरकार प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे नौजवानों के डर से ही संविदाकर्मियों को सौगात नहीं दे रही है। परीक्षाओं की तैयारी कर रहा तबका उपनल या संविदा जैसे सिस्टम को गलत परंपरा मानता है लिहाजा माना जा रहा है कि सरकार नहीं चाहती कि नई पीढ़ी के बीच कोई गलत संदेश जाए और उसकी गलत इमेज बने । तय है कि सरकार सेफ रहना चाहती है ताकि भरोसा बरकरार रहे।

