देहरादून। राजधानी के सबसे बड़े सरकारी मेडिकल संस्थान में नियुक्तियों को लेकर एक नया विवाद सामने आया है, जिसने स्वास्थ्य व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विधानसभा में डॉक्टरों की कमी का मुद्दा उठने के बाद जहां सरकार पर व्यवस्थाएं सुधारने का दबाव बना हुआ है, वहीं दून मेडिकल कॉलेज में नियमों को दरकिनार कर तैनाती किए जाने का मामला चर्चा का विषय बन गया है।
जानकारी के अनुसार, दून मेडिकल कॉलेज में प्राचार्य स्तर से ही नियुक्ति प्रक्रिया में हस्तक्षेप करते हुए डॉ. सलिल गर्ग को तैनाती दे दी गई। हैरानी की बात यह है कि यह तैनाती चिकित्सा शिक्षा निदेशालय की पूर्व अनुमति के बिना ही कर दी गई, जबकि नियमों के अनुसार ऐसी नियुक्तियों में निदेशालय की स्वीकृति अनिवार्य होती है। इस पूरे घटनाक्रम ने न केवल प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर भी गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं।
सूत्रों की मानें तो डॉ. सलिल गर्ग की तैनाती का प्रस्ताव करीब तीन माह पहले सामने आया था, लेकिन उस समय इस पर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया। इसके बाद अचानक से प्राचार्य द्वारा तैनाती आदेश जारी कर दिए गए, जिससे यह मामला और अधिक संदिग्ध हो गया है। सवाल यह उठ रहा है कि आखिर ऐसी क्या जल्दबाजी थी कि बिना उच्च स्तर की अनुमति के ही आदेश जारी कर दिए गए।
विधानसभा में पहले ही डॉक्टरों की कमी को लेकर सरकार और विभाग की कार्यशैली पर सवाल उठ चुके हैं। ऐसे में इस तरह की नियुक्तियां यह संकेत देती हैं कि कहीं न कहीं सिस्टम के भीतर समन्वय की कमी है या फिर नियमों की अनदेखी जानबूझकर की जा रही है। स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली को लेकर लगातार उठ रहे सवालों के बीच यह मामला सरकार के लिए नई मुश्किलें खड़ी कर सकता है।
बताया जा रहा है कि इस मामले को गंभीरता से लेते हुए अब प्राचार्य से जवाब तलब किया जा रहा है। निदेशक चिकित्सा शिक्षा अजय आर्य ने बताया कि मामले में प्राचार्य से जवाब तलब किया जा रहा है कि आखिर किन परिस्थितियों में बिना निदेशालय को विश्वास में लिए यह निर्णय लिया गया। यदि जांच में नियमों का उल्लंघन सामने आता है तो संबंधित अधिकारियों पर कार्रवाई भी संभव है।
विशेषज्ञों का मानना है कि स्वास्थ्य जैसे संवेदनशील क्षेत्र में इस तरह की प्रक्रियात्मक लापरवाही न केवल प्रशासनिक व्यवस्था को कमजोर करती है, बल्कि इसका सीधा असर आम जनता को मिलने वाली सेवाओं पर भी पड़ता है। दून मेडिकल कॉलेज जैसे बड़े संस्थान में यदि नियमों को दरकिनार कर फैसले लिए जाएंगे तो यह पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
फिलहाल, सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि जवाब में क्या निष्कर्ष निकलता है और क्या वास्तव में जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई होती है या फिर यह मामला भी अन्य विवादों की तरह समय के साथ ठंडे बस्ते में चला जाएगा।
“फाइलें घिसती रहीं, आदेश फिसलता गया!”चिकित्सा शिक्षा निदेशालय के आदेश के बिना प्राचार्य ने दे दी डॉक्टर को तैनाती, जवाब तलब….
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