देहरादून। उत्तराखंड की सियासत में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। अरविंद पांडे ने अपने ही कैंप कार्यालय और आवास को लेकर ऐसा कदम उठाया है, जिसने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। संतोष नगर, वार्ड नंबर 3, गूलरभोज स्थित उनके कैंप कार्यालय और आवास को अतिक्रमण की श्रेणी में दर्शाते हुए 19 जनवरी 2026 को नोटिस जारी किया गया था। इस नोटिस के बाद जहां आम तौर पर कानूनी बचाव या स्थगन की कोशिशें देखने को मिलती हैं, वहीं अरविंद पांडे ने उल्टा उप जिला अधिकारी को पत्र लिखकर स्वयं कार्रवाई करने का आग्रह कर दिया।
अपने पत्र में पांडे ने स्पष्ट शब्दों में लिखा है कि यदि उनका कार्यालय एवं आवास सरकारी भूमि पर निर्मित पाया जाता है तो संबंधित अधिकारी उनकी उपस्थिति में उसे कब्जे में लेने की कार्रवाई करें। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि इस कार्रवाई पर उन्हें या उनके वारिसों को कोई आपत्ति नहीं होगी। पांडे का यह रुख राजनीतिक दृष्टि से असामान्य माना जा रहा है, क्योंकि आमतौर पर ऐसे मामलों में जनप्रतिनिधि नोटिस को चुनौती देते हैं या राहत की कोशिश करते हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पांडे का यह कदम सीधे तौर पर पारदर्शिता और जवाबदेही का संदेश देने की कोशिश हो सकता है। वे यह दिखाना चाह रहे हों कि कानून सबके लिए समान है और यदि उन पर आरोप है तो वे जांच और कार्रवाई के लिए तैयार हैं। दूसरी ओर, भाजपा के भीतर चल रही खींचतान के संदर्भ में इसे एक रणनीतिक चाल भी माना जा रहा है। पार्टी के अंदरूनी समीकरणों को देखते हुए इस प्रकरण ने यह संकेत जरूर दिया है कि सब कुछ सामान्य नहीं है।
भाजपा के भीतर इस घटनाक्रम को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ नेताओं का कहना है कि पांडे ने नैतिक आधार पर मजबूत संदेश दिया है, जबकि कुछ इसे राजनीतिक दबाव की प्रतिक्रिया बता रहे हैं। विपक्ष भी इस मुद्दे पर नजर बनाए हुए है और इसे सत्ता पक्ष के अंदरूनी मतभेदों से जोड़कर देख रहा है।
गौरतलब है कि उत्तराखंड में अतिक्रमण के मामलों को लेकर प्रशासन लगातार अभियान चला रहा है। ऐसे में यदि किसी वरिष्ठ नेता के आवास या कार्यालय पर नोटिस जारी होता है तो स्वाभाविक रूप से मामला सुर्खियों में आता है। पांडे द्वारा स्वयं कार्रवाई का आग्रह करने से प्रशासन पर भी निष्पक्षता साबित करने का दबाव बढ़ गया है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह कदम केवल कानूनी प्रक्रिया को तेज करने की कोशिश है या इसके पीछे कोई व्यापक राजनीतिक संदेश छिपा है। क्या पांडे इस प्रकरण के माध्यम से पार्टी नेतृत्व और प्रशासनिक व्यवस्था को आईना दिखाना चाह रहे हैं, या फिर यह भाजपा के भीतर चल रहे शक्ति संतुलन का हिस्सा है? आने वाले दिनों में प्रशासन की कार्रवाई और पार्टी की आधिकारिक प्रतिक्रिया से इस पूरे घटनाक्रम की दिशा और स्पष्ट होगी। फिलहाल इतना तय है कि इस पत्र ने उत्तराखंड की राजनीति में नई बहस को जन्म दे दिया है।


