देहरादून।
सचिवालय संघ के चुनाव की तिथि भले ही अभी औपचारिक रूप से घोषित न हुई हो, लेकिन उससे पहले ही चुनावी माहौल पूरी तरह गरमा गया है। चुनाव मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे संभावित प्रत्याशियों ने अभी से ही सचिवालय के कर्मचारियों को साधने की कवायद तेज कर दी है। कोई कर्मचारियों की वर्षों पुरानी मांगों को पूरा कराने के बड़े-बड़े दावे कर रहा है तो कोई सीधे-सीधे सुविधाओं के जरिए सदस्यों को रिझाने में जुट गया है। इन्हीं कोशिशों के बीच सचिवालय परिसर में इन दिनों सबसे ज्यादा चर्चा कैंटीन में मुफ्त खाने की व्यवस्था को लेकर हो रही है, जिसे कई लोग चुनावी प्रलोभन के तौर पर देख रहे हैं। दरअसल, सचिवालय संघ के संभावित चुनाव को देखते हुए कुछ प्रत्याशी लगातार कर्मचारियों से संपर्क बढ़ा रहे हैं। सुबह से लेकर शाम तक सचिवालय के गलियारों, कैंटीन और दफ्तरों में संभावित प्रत्याशियों की मौजूदगी आम हो गई है। कोई वेतन विसंगति, पदोन्नति, स्थानांतरण नीति और कार्यदायित्वों से जुड़ी समस्याओं को प्राथमिकता में रखने की बात कर रहा है तो कोई कर्मचारियों की सुविधाओं को लेकर बड़े वादे कर रहा है। इसी क्रम में कैंटीन में मुफ्त भोजन की व्यवस्था चर्चा का केंद्र बन गई है। कर्मचारियों के एक वर्ग का मानना है कि यह सीधे तौर पर चुनावी लाभ लेने की कोशिश है, जबकि कुछ लोग इसे केवल आपसी सहयोग और सौहार्द का उदाहरण बता रहे हैं।
इसी बीच शुक्रवार को सचिवालय में एक आम सभा का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें वर्तमान कार्यकारणी सचिवालय संघ अपने कार्यकाल की उपलब्धियों को कर्मचारियों के सामने रखेगा। इस सभा में जहां बीते कार्यकाल में किए गए कार्यों का ब्योरा दिया जाएगा, वहीं भविष्य की रणनीति और आगे का एजेंडा भी प्रस्तुत किया जाएगा।जिसको लेकर पूर्व अध्यक्ष पहले ही कई गंभीर सवाल खड़े कर चुके है कर्मचारियों की नजर इस बात पर भी टिकी है कि वर्तमान कार्यकारणी अपने कार्यों को किस तरह प्रस्तुत करती है और कर्मचारियों को कितना संतुष्ट कर पाती है।
हालांकि, चुनाव की तिथि घोषित होने से पहले ही मुफ्त खाने जैसी व्यवस्थाओं को लेकर कई सवाल भी उठने लगे हैं। सचिवालय के कुछ वरिष्ठ कर्मचारी इसे चुनावी आचार संहिता की भावना के खिलाफ मान रहे हैं, भले ही औपचारिक रूप से आचार संहिता अभी लागू न हुई हो। उनका कहना है कि ऐसे प्रलोभन अल्पकालिक हो सकते हैं, लेकिन कर्मचारी अब केवल वादों या तात्कालिक सुविधाओं से प्रभावित होने वाले नहीं हैं। वे चाहते हैं कि जो भी नेतृत्व आए, वह कर्मचारियों की वास्तविक समस्याओं का स्थायी समाधान करे। उनके अनुसार, असली परीक्षा तो चुनाव के बाद होती है, जब चुने गए प्रतिनिधियों को अपने वादों पर खरा उतरना होता है। कुल मिलाकर सचिवालय संघ चुनाव की तारीख घोषित होने से पहले ही माहौल पूरी तरह चुनावी रंग में रंग चुका है। अब देखना यह होगा कि मुफ्त खाने जैसे प्रलोभन कर्मचारियों के मत को कितना प्रभावित करते हैं या फिर कर्मचारी इस बार ठोस काम और विश्वसनीय नेतृत्व को तरजीह देते हैं।
सचिवालय कैंटीन बना चुनावी अखाड़ा, मुफ्त भोजन बना चर्चाओं का विषय….
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