उत्तराखंड वन संसाधन प्रबंधन परियोजना के दूसरे चरण की प्रारंभिक रिपोर्ट तैयार हो गई है, जिसका उद्देश्य वनों का संरक्षण और स्थानीय समुदायों का विकास है। वर्ष 2026 से 2035 तक चलने वाली इस 10 वर्षीय परियोजना की कुल लागत ₹1500 करोड़ प्रस्तावित है। इस महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट के तहत राज्य में बढ़ रहे मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने और जैव विविधता को बचाने पर विशेष जोर दिया जाएगा। वन मंत्री सुबोध उनियाल और जायका इंडिया के मुख्य प्रतिनिधि टेकुच्ची टुकुरो के बीच हुई बैठक में इस योजना के वित्तीय ढांचे और कार्यान्वयन पर विस्तार से चर्चा की गई।
परियोजना का बजट और प्रमुख लक्ष्य
इस महत्वाकांक्षी परियोजना में 85 प्रतिशत हिस्सा ‘जायका’ द्वारा वहन किया जाएगा, जबकि शेष 15 प्रतिशत अंश राज्य सरकार का होगा। इसका मुख्य केंद्र मानव-वन्यजीव संघर्ष की रोकथाम, इको-रेस्टोरेशन (पारिस्थितिकी तंत्र का पुनरुद्धार), और जड़ी-बूटी रोपण है। इसके साथ ही, स्थानीय लोगों की आजीविका सुधारने के लिए उन्हें विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा और कृषि वानिकी को बढ़ावा दिया जाएगा ताकि ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत हो सके।
विस्तार और वर्तमान कार्यों की समीक्षा
जायका का दूसरा चरण प्रदेश की 47 रेंजों में प्रस्तावित है। अधिकारियों ने बताया कि वर्तमान में संचालित कार्यों के तहत 13 वन प्रभागों की 36 रेंजों और 839 वन पंचायतों में चल रहे कार्यों पर संतोष व्यक्त किया गया है। भू-कटाव रोकने के लिए जापानी तकनीक का उपयोग करते हुए तीन मॉडल साइट्स पर कार्य किया जा रहा है, जो इस माह के अंत तक पूरा होने की संभावना है।
जापानी तकनीक से होगा विकास
बैठक में मुख्य विकास संचालक विनीत सरीन और परियोजना निदेशक नरेश कुमार ने तकनीकी पहलुओं की जानकारी दी। उन्होंने स्पष्ट किया कि जापानी तकनीक के समावेश से न केवल वनों की गुणवत्ता में सुधार होगा, बल्कि आधुनिक तरीकों से वन संपदा का संरक्षण भी सुनिश्चित किया जा सकेगा। यह परियोजना उत्तराखंड के हिमालयी पर्यावरण को सुरक्षित रखने की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है।

