जमीन पर सवाल, रील में कमाल…. रियल्टी गायब, रील हाज़िर—सरकारी सिस्टम का नया चेहरा…

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सोशल मीडिया आज के दौर में सूचना और संवाद का एक बेहद प्रभावी माध्यम बन चुका है। सरकारें, सरकारी विभाग और अधिकारी भी अब इस प्लेटफॉर्म की ताकत को समझने लगे हैं। योजनाओं की जानकारी आम जनता तक तेजी से पहुंचाने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया जाना अपने आप में एक सकारात्मक पहल माना जा सकता है। लेकिन अब तस्वीर कुछ अलग नजर आने लगी है। कई सरकारी महकमे काम से ज्यादा उसके प्रदर्शन पर जोर देते दिखाई दे रहे हैं, जहां काम की वास्तविकता से ज्यादा उसकी “रील” बनाकर दिखावा प्राथमिकता बनता जा रहा है।
आजकल सरकारी सिस्टम में काम शुरू होने से पहले कैमरा तैयार रहता है। कोई निरीक्षण हो, या हो कोई कार्रवाई हर गतिविधि के साथ मोबाइल कैमरे और वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य सी हो गई है। ऐसा लगता है जैसे हर विभाग ने अनौपचारिक रूप से एक छोटी-सी मीडिया टीम ही तैयार कर ली हो, जिसका मुख्य काम है—हर गतिविधि की रील बनाना और उसे सोशल मीडिया पर वायरल करना।
दिलचस्प बात यह है कि कई बार काम से ज्यादा उसकी शूटिंग पर ध्यान दिया जाता है। अधिकारी और कर्मचारी यह सुनिश्चित करते हैं कि वीडियो का एंगल सही हो, बैकग्राउंड ठीक हो और कैमरे में ऐसा दृश्य कैद हो जिससे लगे कि सिस्टम पूरी ताकत से काम कर रहा है। कुछ ही मिनटों में वीडियो को एडिट कर रील बनाई जाती है और फिर उसे फेसबुक, इंस्टाग्राम या एक्स जैसे प्लेटफॉर्म पर अपलोड कर दिया जाता है। इसके बाद शुरू होता है लाइक, शेयर और कमेंट का सिलसिला।
सरकारी महकमों की इस नई प्रवृत्ति को लेकर अब सवाल भी उठने लगे हैं। आम लोगों का कहना है कि अगर उतनी ही ऊर्जा और समय वास्तविक काम में लगाया जाए, जितना रील बनाने में लगाया जा रहा है, तो शायद कई समस्याएं अपने आप हल हो जाएं। जनता को दिखावे से ज्यादा परिणाम चाहिए, लेकिन कई जगहों पर ऐसा प्रतीत होता है कि काम कम और उसका प्रचार ज्यादा हो रहा है। कई विभागों में तो स्थिति ऐसी बन गई है कि किसी भी गतिविधि को तब तक पूरा नहीं माना जाता जब तक उसकी वीडियो क्लिप सोशल मीडिया पर पोस्ट न हो जाए। मानो सरकारी कामकाज का एक नया नियम बन गया हो—“जो दिखता है वही बिकता है।” नतीजा यह है कि काम की असली गुणवत्ता और उसकी निरंतरता से ज्यादा उसकी डिजिटल प्रस्तुति पर जोर दिया जा रहा है।
विशेषज्ञों का भी मानना है कि सोशल मीडिया का उपयोग पारदर्शिता और सूचना प्रसार के लिए होना चाहिए, लेकिन यदि यह केवल छवि निर्माण का माध्यम बनकर रह जाए तो इसका उद्देश्य कमजोर पड़ जाता है। जनता को योजनाओं के वीडियो से ज्यादा उनके परिणामों की जरूरत होती है।
दरअसल असली चुनौती यह है कि सरकारी सिस्टम अपनी प्राथमिकताओं को सही ढंग से तय करे। यदि विभाग यह समझ जाएं कि रील बनाने से ज्यादा जरूरी काम को जमीन पर बेहतर ढंग से करना है, तो जनता का विश्वास भी स्वतः मजबूत होगा। काम अच्छा होगा तो उसकी चर्चा अपने आप होगी, उसे दिखाने के लिए अलग से मंच तैयार करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
फिलहाल सरकारी दफ्तरों में “रील कल्चर” तेजी से बढ़ता दिखाई दे रहा है। अब देखना यह है कि यह केवल प्रचार का माध्यम बनकर रह जाता है या फिर वास्तव में जनता तक जानकारी पहुंचाने का प्रभावी तरीका साबित होता है। लेकिन इतना जरूर है कि जब काम से ज्यादा कैमरा सक्रिय हो जाए, तो सवाल उठना लाजिमी है—सरकारी सिस्टम काम कर रहा है या उसकी रील बनाने में रुचि दिखा रहा है ?

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