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देहरादून। उत्तराखंड की सियासत में लंबे समय से एक अजीब सा मिथक चर्चा का विषय बना रहा—मुख्यमंत्री आवास का मिथक। कहा जाता रहा कि जो भी मुख्यमंत्री देहरादून स्थित इस सरकारी आवास को अपना स्थायी निवास बनाता है, वह अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाता। सियासी साजिशें, अंदरूनी बगावत और नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाएं उसके कार्यकाल को अधूरा छोड़ देती हैं। लेकिन अब मौजूदा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस धारणा को पूरी तरह चुनौती देते हुए इसे लगभग तोड़ दिया है।
उत्तराखंड के राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो कई बड़े नाम इस मिथक से जुड़े दिखाई देते हैं। रमेश पोखरियाल निशंक, बी.सी. खंडूड़ी, विजय बहुगुणा और त्रिवेंद्र सिंह रावत जैसे नेताओं ने मुख्यमंत्री आवास में रहते हुए शासन किया, लेकिन इनमें से कोई भी अपने पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया। खास बात यह रही कि त्रिवेंद्र सिंह रावत प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आए थे, इसके बावजूद उनका कार्यकाल बीच में ही समाप्त हो गया।
इन घटनाओं के चलते धीरे-धीरे यह धारणा बन गई कि यह मुख्यमंत्री आवास “मनहूस” है। कई सियासी हलकों में इसे लेकर तरह-तरह की बातें होने लगीं। यहां तक कि हरीश रावत ने तो इस आवास से दूरी बनाए रखना ही बेहतर समझा और बीजापुर गेस्ट हाउस से ही अपना सरकारी कामकाज चलाते रहे। इससे इस मिथक को और हवा मिली कि यह आवास मुख्यमंत्रियों के लिए शुभ नहीं है।
लेकिन वर्तमान परिदृश्य में स्थिति बिल्कुल बदलती नजर आ रही है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस मिथक को न केवल चुनौती दी, बल्कि अपने कार्यकाल के दौरान इसे कमजोर भी कर दिया है। धामी लगातार इस आवास में रहते हुए अपने प्रशासनिक कार्यों को अंजाम दे रहे हैं और अब तक उनके खिलाफ न तो कोई बड़ी बगावत सामने आई है और न ही कोई गंभीर सियासी संकट देखने को मिला है।
धामी की कार्यशैली को लेकर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उन्होंने संगठन और सरकार के बीच बेहतर तालमेल स्थापित किया है। “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास” के मंत्र के साथ उन्होंने न केवल प्रशासनिक स्तर पर काम किया, बल्कि संगठन के भीतर भी संतुलन बनाए रखा। यही वजह है कि उनके कार्यकाल में स्थिरता साफ तौर पर दिखाई देती है।
दिलचस्प बात यह भी है कि धामी ने अपने पहले छोटे कार्यकाल से लेकर अब तक मुख्यमंत्री आवास को पूरी तरह अपनाया है और वहीं से शासन चलाया है। उन्होंने यह साबित किया है कि किसी स्थान या भवन से ज्यादा मायने नेतृत्व की कार्यशैली और निर्णय लेने की क्षमता रखती है।
राजनीति में उनका एक और बड़ा उदाहरण उस समय सामने आया जब वे अपने गृह क्षेत्र से चुनाव हार गए थे। आमतौर पर ऐसी स्थिति में किसी भी नेता का राजनीतिक भविष्य प्रभावित हो सकता है, लेकिन धामी के मामले में ऐसा नहीं हुआ। भाजपा हाईकमान ने उन पर भरोसा जताते हुए उन्हें दोबारा मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी सौंपी। यह अपने आप में एक बड़ा संकेत था कि पार्टी उनके नेतृत्व को कितना महत्व देती है।
यही कारण है कि अब यह कहा जाने लगा है कि जिस मुख्यमंत्री आवास ने पहले कई दिग्गज नेताओं की सियासी राह को कठिन बनाया, वही आवास अब धामी के लिए शक्ति का केंद्र बन गया है। जहां पहले कुर्सियां डगमगाती थीं, वहीं अब स्थिरता का माहौल दिखाई दे रहा है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार, धामी का यह दौर उत्तराखंड की राजनीति में एक बदलाव का संकेत भी है। यह दर्शाता है कि अब सियासत में अंधविश्वास या मिथकों की जगह कार्यशैली, प्रदर्शन और नेतृत्व क्षमता ने ले ली है।
कुल मिलाकर, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने न केवल अपने नेतृत्व से सरकार को स्थिरता दी है, बल्कि उस पुराने मिथक को भी तोड़ने की दिशा में मजबूत कदम बढ़ाया है, जो लंबे समय से उत्तराखंड की राजनीति पर छाया हुआ था। आने वाले समय में यदि यह क्रम जारी रहता है, तो यह मिथक पूरी तरह इतिहास बन सकता है और धामी का नाम उस बदलाव के साथ हमेशा के लिए जुड़ जाएगा, जिसने सियासत की एक पुरानी धारणा को बदल दिया।

