उत्तराखंड शासन ने विकास परियोजनाओं को गति देने के लिए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी बना दिया है। अब लंबी और जटिल कानूनी प्रक्रिया के बजाय ‘आपसी सहमति’ के आधार पर सीधे जमीन खरीदी जा सकेगी। नई व्यवस्था के तहत शहरी क्षेत्रों में बाजार मूल्य का 2 गुना और ग्रामीण इलाकों में 4 गुना तक मुआवजा देने का प्रावधान किया गया है। इससे सड़क, बांध और उद्योगों जैसे प्रोजेक्ट्स के लिए जमीन मिलना आसान होगा और भू-स्वामियों को उनकी संपत्ति का उचित दाम समय पर मिल सकेगा।
आपसी सहमति और समितियों का गठन
नई नीति के अनुसार, अब जमीन खरीदने के लिए भू-स्वामियों की लंबी प्रतीक्षा खत्म होगी। यदि 60% भू-स्वामी सहमत होते हैं, तो जिला प्रशासन सीधे जमीन खरीद सकेगा। इस प्रक्रिया को सुचारू बनाने के लिए दो स्तर पर समितियाँ बनाई गई हैं: 10 करोड़ रुपये तक के प्रोजेक्ट के लिए अपर जिलाधिकारी (ADM) और 10 करोड़ से अधिक के प्रोजेक्ट के लिए जिलाधिकारी (DM) की अध्यक्षता में समिति निर्णय लेगी।
मुआवजे का पारदर्शी निर्धारण
जमीन की कीमत तय करने के लिए पिछले तीन वर्षों के बैनामों के औसत या वर्तमान सर्किल दर, जो भी अधिक हो, उसे आधार माना जाएगा। किसानों के हितों का विशेष ध्यान रखते हुए प्रावधान किया गया है कि यदि कोई किसान भूमिहीन होता है, तो उसे 25% अतिरिक्त मुआवजा मिलेगा। इसके अलावा, जमीन पर मौजूद फसल, पेड़ या भवन का मूल्यांकन अलग से किया जाएगा और मुआवजे में जोड़ा जाएगा।
विवाद सुलझाने और अपील की व्यवस्था
यदि कोई भू-स्वामी समिति के निर्णय से संतुष्ट नहीं है, तो वह 30 दिनों के भीतर मंडलायुक्त के पास अपील कर सकता है। शासन ने साफ किया है कि यदि आपसी सहमति नहीं बनती है, तभी सरकार ‘भूमि अर्जन अधिनियम-2013’ के तहत अनिवार्य अधिग्रहण की प्रक्रिया अपनाएगी। इस पूरी प्रक्रिया में रजिस्ट्री और स्टांप शुल्क का खर्च संबंधित विभाग उठाएगा, जिससे जनता पर कोई अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ेगा।

