कांग्रेस के नए सूत्र से उड़ी दिग्गजों की नींद,किसकी करेंगे पैरवी “अपनी या अपनो की”..!

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हरीश रावत की सियासी छुट्टियों ने कांग्रेस आलाकमान की नींद कई दिन तक उड़कर रखी। आलाकमान को अब भी चैन की नींद आएगी या नहीं कहना मुश्किल है। क्योंकि सोशल मीडिया पर हरदा ने नया पोस्ट डाला है न कांग्रेस छोड़ी है न क्षेत्र छोड़ा है।
बहरहाल हरदा की छुट्टियो ने कांग्रेस प्रभारी शैलजा दिल्ली से देहरादून का सफर करवा दिया। प्रभारी के प्रोग्राम गढ़वाल से लेकर कुमांऊ तक फिक्स हुए, कार्यकर्ताओं के साथ कई मुद्दों पर मंथन हुआ उन्हें चुनावी संग्राम में कांग्रेस को मजबूत करने के टिप्स दिए गए। साथ ही साफ भी किया गया कि नेता ‘मैं’के भाव को भूल कर ‘हम’ पर काम करें ताकि कांग्रेस 2027 के चुनावी समर के लिए मजबूत हो सके। चुनावी नतीजे बेहतर हासिल हो सकें। अब पार्टी की प्रदेश प्रभारी पांच के दौरे को चार दिन में निबटाकर दिल्ली चली गई । लेकिन जाते-जाते जो मैसेज दिया उससे कई आलानेताओं की नींद उड़ गई है।

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दरअसल कुमारी शैलजा ने दो टूक कह दिया है कि परिवारवाद को चुनाव में पनाह नहीं दी जाएगी। एक परिवार एक टिकट पर काम होगा। ताकि विपक्ष चुनावी सभाओं में परिवारवाद का आरोप न लगा सके। शैलजा के इस फरमान से सियासी छुट्टियों वाले हरदा हों या पार्टी में अपने सुनहरे भविष्य के ख्वाब सजाने वाले यशपाल आर्य सभी बेचैन हैं। दरअसल अगर पार्टी ने वाकई में अपने इस सूत्र पर काम किया तो हरीश रावत हों या यशपाल आर्य सबके अरमान बिखर जांएगे।

दरअसल यशपाल आर्य के बेटे एक चुनाव भाजपा के टिकट पर नैनीताल से जीते हैं। जबकि दूसरा चुनाव कांग्रेस के टिकट पर लड़ कर हारे हैं। कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुई सरिता आर्य ने संजीव आर्य को हराया। यानि अभी मुकाबला बराबर का है एक हार एक जीत के साथ।

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उधर हरदा की बेटी अनुपमा रावत मौजूदा वक्त में हरिद्वार ग्रामीण से विधायक हैं, और बेटा आनंद रावत भी चुनाव लड़ने की हसरत पाले हुए हैं। देखा जाए तो हरदा का मन भी अभी सियासत से ऊबा नहीं है। सत्ता के अरमानो का हिरन अभी भी उनके दिलो-दिमाग में कुलांचे भरता है। बवजूद इसके हरदा ने प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा के उत्तराखंड दौरे पर छुट्टी के बहाने पार्टी कार्यक्रमो से दूरी बनाकर रखी।

हालांकि शैलजा के दिल्ली जाने के साथ ही हरदा ने सोशल मीडिया के जरिए अपने मन की बात रख दी है कि, बेशक वे चुनाव हारे हैं, लेकिन उन्होंने न तो कांग्रेस छोड़ी है न क्षेत्र छोड़ा है। लोग इसके माएने भी निकाल रहे हैं कि आखिर क्षेत्र का मतलब क्या है कहीं चुनावी रणभूमि तो नहीं और अगर है तो फिर वो पार्टी की नई गाइड लाइन पर कहां फिट बैठेंगे। एक परिवार एक टिकट के सूत्र पर हरदा खेमे से किसको कुर्बानी देनी होगी। फिर पिता,पुत्र और पुत्री मे से किसको रणभूमि में उतरने की इजाजत मिलेगी।

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इसी दुविधा में यशपाल आर्य भी होंगे कि एक टिकट वे खुद के लिए चांहे या पुत्र के लिए मांगे। बहरहाल कांग्रेस के क्षेत्रीय क्षत्रपों के माथे पर शिकन की लकीरें उभर गई हैं। होगा क्या ये तो वक्त ही बताएगा फिलहाल कांग्रेस में मंथन का दौर जारी है, कि जंग किससे लड़े खुद से,अपने मन से, फरमान सुनाने वालों से या फूल वालों से जिनके चुनावी इंतजाम ने,पिछले 9 सालों से हाथ को सत्ता की कुर्सी नहीं पकड़ने दी।

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