देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों अरविंद पांडे और उधम सिंह नगर जनपद का प्रशासन चर्चा के केंद्र में है। गूलरभोज स्थित उनके आवास की भूमि को लेकर उठे विवाद ने अब राजनीतिक रंग ले लिया है। एक ओर प्रशासन की ओर से अतिक्रमण को लेकर कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू की गई, तो दूसरी ओर पांडे के लगातार पत्राचार ने पूरे घटनाक्रम को और पेचीदा बना दिया है।
मामला तब तूल पकड़ा जब उप जिलाधिकारी, गदरपुर की ओर से विधायक अरविंद पांडे को नोटिस जारी कर सरकारी भूमि को स्वयं अतिक्रमण मुक्त करने के लिए कहा गया । प्रशासन का स्पष्ट रुख था कि यदि भूमि पर अतिक्रमण पाया गया है तो संबंधित पक्ष स्वयं उसे हटाए। लेकिन इसके बाद जो हुआ, उसने सियासी हलकों में नई बहस छेड़ दी।
नोटिस के जवाब में पांडे ने एक पत्र लिखकर प्रशासन से आग्रह किया कि उनके कार्यालय और आवास को उनकी उपस्थिति में कब्जे में लिया जाए। उन्होंने यह भी कहा कि यदि निर्माण सरकारी भूमि पर है तो उन्हें या उनके वारिसों को कोई आपत्ति नहीं होगी। इस कदम को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं कि जब प्रशासन पहले ही स्वयं अतिक्रमण हटाने को कह चुका था, तो फिर इस ‘लेटर गेम’ की जरूरत क्यों पड़ी? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पांडे का यह कदम एक सोची-समझी रणनीति भी हो सकता है। संभव है कि वे यह संदेश देना चाह रहे हों कि वे कानून से ऊपर नहीं हैं और जांच व कार्रवाई के लिए तैयार हैं। लेकिन दूसरी ओर आलोचकों का कहना है कि यदि सचमुच वे अतिक्रमण हटाने के इच्छुक थे तो प्रशासनिक नोटिस के अनुरूप स्वयं कार्रवाई क्यों नहीं की गई? पत्र लिखकर जिम्मेदारी प्रशासन पर डालना क्या एक राजनीतिक चाल है?
भाजपा के भीतर भी इस मुद्दे को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। हालांकि पार्टी की ओर से आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन अंदरखाने इस घटनाक्रम को लेकर चर्चा तेज है। विपक्ष ने भी इस मामले को हाथोंहाथ लिया है और इसे सत्ता पक्ष के भीतर के अंतर्विरोधों से जोड़कर देखा जा रहा है।
आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए यह पूरा प्रकरण और महत्वपूर्ण हो जाता है। गूलरभोज की जमीन का विवाद केवल प्रशासनिक कार्रवाई तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह पांडे की राजनीतिक छवि से भी जुड़ गया है। उनका पत्र जहां कुछ लोगों को पारदर्शिता का संदेश देता दिखता है, वहीं अन्य इसे ‘लेटर बम’ करार दे रहे हैं, जो उल्टा उन्हीं पर भारी पड़ सकता है।
अब सबकी नजर प्रशासन की अगली कार्रवाई पर है। क्या प्रशासन सीधे कब्जा लेगा, या पहले विधायक को स्वयं अतिक्रमण हटाने का अवसर देगा? और क्या यह प्रकरण चुनावी मुद्दा बनेगा? फिलहाल इतना तय है कि अरविंद पांडे और उधम सिंह नगर प्रशासन के बीच चल रहा यह पत्राचार राजनीतिक हलकों में चर्चा और अटकलों का बाजार गर्म किए हुए है।


