ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतों में आए उछाल और विदेशी निवेशकों द्वारा भारतीय बाजार से लगातार पैसा निकालने की वजह से भारतीय रुपये में भारी गिरावट दर्ज की गई है। शुक्रवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया 89 पैसे टूटकर पहली बार 94.85 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर बंद हुआ। यह पिछले 10 साल की सबसे बड़ी गिरावट मानी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर पश्चिम एशिया में तनाव इसी तरह जारी रहा, तो आने वाले दिनों में रुपये की कीमत में और भी कमी देखने को मिल सकती है, जिससे आयात महंगा होगा और देश में महंगाई बढ़ सकती है।
रुपये पर दबाव बढ़ने के मुख्य कारण
रुपये की इस रिकॉर्ड गिरावट के पीछे कई अंतरराष्ट्रीय कारण जिम्मेदार हैं। मुख्य रूप से कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में आई तेजी, वैश्विक बाजारों में डॉलर का मजबूत होना और पश्चिम एशिया में जारी युद्ध जैसे तनाव की वजह से भारतीय मुद्रा पर दबाव बढ़ा है। इसके अलावा, विदेशी संस्थागत निवेशकों द्वारा भारतीय शेयर बाजार में की जा रही लगातार बिकवाली ने भी स्थिति को गंभीर बना दिया है।
अर्थव्यवस्था और आम जनता पर प्रभाव
रुपये के कमजोर होने का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। विशेषज्ञों के अनुसार, आयात महंगा होने से व्यापार घाटा बढ़ सकता है। सरकार को या तो अपने राजकोषीय घाटे को बढ़ाना पड़ेगा या फिर विकास कार्यों के लिए रखे गए बजट में कटौती करनी पड़ सकती है। आम जनता के लिए इसका मतलब है—पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी और विदेशों से आने वाली वस्तुओं (जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स और खाद्य तेल) का महंगा होना।
10 साल की सबसे बड़ी गिरावट के आंकड़े
आंकड़ों पर गौर करें तो ईरान युद्ध के बाद से रुपया करीब 4% तक टूट चुका है। अकेले इस वित्त वर्ष में रुपये की कीमत में लगभग 11% की गिरावट आई है। शुक्रवार को कारोबार के दौरान रुपया एक समय 94.18 पर खुला था, लेकिन बाजार बंद होने तक यह टूटकर 94.85 के स्तर पर पहुंच गया, जो अब तक का सबसे न्यूनतम स्तर है।+

