देहरादून के जंगलों में ‘हॉपलो’ (साल बोरर) नामक खतरनाक कीट का संक्रमण तेजी से फैल रहा है, जिसकी वजह से करीब 19 हजार साल के पेड़ पूरी तरह सूख चुके हैं। संक्रमण इतना गंभीर है कि अन्य स्वस्थ पेड़ों को बचाने के लिए इन सूखे पेड़ों को तुरंत काटना अनिवार्य हो गया है। वन विभाग ने इसके लिए केंद्र सरकार से अनुमति मांगी है। चिंता की बात यह है कि मुख्य संक्रमण को रोकने के लिए ‘ट्री ट्रैप’ ऑपरेशन के तहत करीब 3 हजार हरे पेड़ों को भी काटने की तैयारी है। इस संक्रमण के बाद लकड़ी को सुरक्षित रखने के लिए अलग डिपो बनाए जा रहे हैं ताकि कीट अन्य क्षेत्रों में न फैल सकें।
क्यों और कैसे फैला यह खतरनाक इन्फेक्शन?
विशेषज्ञों के अनुसार, हॉपलो या साल बोरर एक प्रकार का ‘वुड-बोरिंग बीटल’ (कीड़ा) है। इसकी मादा कीट साल के पेड़ की जड़ों और तने में अंडे देती है, जिसका लार्वा पेड़ के अंदर घुसकर उसकी जाइलम को नष्ट कर देता है। इससे पेड़ को पानी मिलना बंद हो जाता है और वह धीरे-धीरे सूख जाता है। अधिकारियों का मानना है कि पिछले साल हुई अत्यधिक बारिश और जलवायु परिवर्तन की वजह से इन कीटों की संख्या में अचानक भारी बढ़ोतरी हुई है।
संक्रमण रोकने के लिए ‘ट्री ट्रैप’ ऑपरेशन
सूखे पेड़ों से भी ज्यादा चिंता उन हरे पेड़ों की है जो कीटों के निशाने पर हैं। कीट नियंत्रण के लिए वन विभाग ‘ट्री ट्रैप’ तकनीक अपना रहा है। इसके तहत लगभग 3 हजार हरे साल के पेड़ों को काटकर 4 फुट लंबे लट्ठों में बदला जाएगा। मानसून के दौरान साल की ताजी लकड़ी की खुशबू इन कीटों को अपनी ओर आकर्षित करती है, जिससे वे इन लट्ठों पर आकर इकट्ठा हो जाएंगे और उन्हें आसानी से पकड़कर नष्ट किया जा सकेगा।
जंगल की भूमि पर अतिक्रमण और AI का उपयोग
खबर के एक अन्य हिस्से में बताया गया है कि वन भूमि पर बढ़ते अवैध कब्जों को रोकने के लिए सरकार अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित सिस्टम का सहारा लेगी। देहरादून के रायपुर रेंज में बिना अनुमति बिजली की लाइन बिछाने के मामले में एक अवर अभियंता पर केस भी दर्ज किया गया है। विभाग का लक्ष्य जंगलों की डिजिटल निगरानी करना है ताकि भविष्य में किसी भी अवैध निर्माण या पेड़ों की कटाई पर तुरंत रोक लगाई जा सके।
मुख्य प्रभावित क्षेत्र
यह संकट मुख्य रूप से देहरादून वन प्रभाग के थानो, आशारोड़ी और झाझरा रेंज में देखा जा रहा है। संक्रमण को देखते हुए वन निगम को रायवाला और झाझरा में अलग लकड़ी डिपो बनाने के लिए करीब तीन हेक्टेयर जमीन दी जा रही है, ताकि संक्रमित लकड़ी को सामान्य लकड़ी से दूर रखा जा सके।

