उत्तराखंड बोर्ड की परीक्षाओं में एक चौंकाने वाला रुझान सामने आया है, जहां पिछले साल हिंदी विषय में 6,481 छात्र असफल रहे। यह स्थिति इसलिए चिंताजनक है क्योंकि जिस भाषा को बच्चे बचपन से बोल रहे हैं, उसे सही ढंग से लिखने में उन्हें कठिनाई महसूस हो रही है। रिपोर्ट के अनुसार, केवल बोर्ड स्कूल ही नहीं बल्कि देहरादून के प्रतिष्ठित सीबीएसई स्कूलों के 90% बच्चे ‘देहरादून’ और ‘आसन’ जैसे सामान्य शब्द भी सही नहीं लिख पा रहे हैं। मातृभाषा होने के बावजूद हिंदी के प्रति छात्रों की यह विफलता राज्य की शिक्षा व्यवस्था और बच्चों की भाषा पर पकड़ को लेकर कई सवाल खड़े कर रही है।
छात्राओं की तुलना में छात्र अधिक कमजोर
पिछले साल के परिणामों के आंकड़ों पर नजर डालें तो छात्राओं के मुकाबले छात्रों का प्रदर्शन हिंदी में अधिक खराब रहा है। 10वीं की परीक्षा में 2,387 छात्र और 1,195 छात्राएं हिंदी में फेल हुए। वहीं, 12वीं की परीक्षा में 1,974 छात्र और 925 छात्राएं परीक्षा उत्तीर्ण नहीं कर पाए। हालांकि, साल 2023 के मुकाबले इस संख्या में थोड़ी गिरावट आई है (2023 में 9,699 बच्चे फेल हुए थे), लेकिन फिर भी फेल होने वाले बच्चों का आंकड़ा काफी बड़ा है।
हिंदी में विफलता के मुख्य कारण
उच्च शिक्षा विभाग के संयुक्त निदेशक आनंद सिंह उनियाल ने इसके कई सामाजिक और तकनीकी कारण बताए हैं। शिक्षा विभाग निदेशक उनियाल ने बताया कि आज के दौर में अभिभावक और छात्र अंग्रेजी को ही सफलता की एकमात्र कुंजी मानने लगे हैं। दूसरा और सबसे अहम कारण यह है कि मोबाइल और इंटरनेट पर अंग्रेजी का अधिक उपयोग होने से शुद्ध हिंदी लेखन की क्षमता लगातार घट रही है। तीसरा बड़ा कारण यह है कि बच्चों में हिंदी किताबें, समाचार पत्र और साहित्य पढ़ने की रुचि कम हो गई है, जिससे उनकी शब्दावली और व्याकरण कमजोर हो रही है।

