हरीश रावत का छुट्टी पर जाना बना चर्चाओं का विषय..“राजनीति से ब्रेक या ब्रेक के नाम पर खेल रहे प्रेशर गेम?”

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देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में सुर्खियों में बने रहने का हुनर अगर किसी के पास सबसे अलग अंदाज में है, तो वह हैं Harish Rawat। कभी राजनीति से “तौबा” की बात, तो कभी अचानक 15 दिन की छुट्टी का ऐलान—वह भी सीधे सोशल मीडिया के जरिए। यह अंदाज अब इतना आम हो चुका है कि लोग यह समझ ही नहीं पाते कि यह गंभीर राजनीतिक संदेश है या फिर चर्चा में बने रहने की एक और रणनीति।
हाल ही में 15 दिन की छुट्टी पर जाने का उनका फैसला भी कुछ ऐसा ही रहा। न कोई औपचारिक मंच, न कोई राजनीतिक बैठक—सीधे सोशल मीडिया पर ऐलान। सवाल यह है कि जब कोई नेता उस उम्र के पड़ाव पर है, जहां आमतौर पर लोग आराम और चिंतन को प्राथमिकता देते हैं, तो फिर बार-बार “सक्रिय राजनीति” के दावे और “छुट्टी” के ऐलान के बीच यह विरोधाभास आखिर क्या संकेत देता है?
हरीश रावत का यह “आना-जाना” अब राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है। कभी वह खुद को राजनीति से दूर बताते हैं, तो कुछ ही दिनों बाद फिर पूरी सक्रियता के साथ मैदान में दिखाई देते हैं। यह सिलसिला अब केवल व्यक्तिगत स्टाइल नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर उनकी स्थिति को भी उजागर करता नजर आता है।
चर्चाओं की मानें तो पार्टी में उनके करीबी नेताओं को जगह न मिलने से नाराजगी बढ़ी है। ऐसे में उनके सोशल मीडिया पोस्ट अब महज विचार नहीं, बल्कि “दबाव की राजनीति” का माध्यम बनते दिख रहे हैं। हर बयान के पीछे एक संदेश छिपा होता है—या यूं कहें कि हर पोस्ट एक “पॉलिटिकल सिग्नल” बन चुका है।
विडंबना यह भी है कि जिस तरह से वह कभी राजनीति से दूरी बनाने की बात करते हैं, उसी तेजी से फिर सक्रिय हो जाते हैं। इससे यह सवाल उठता है कि क्या यह सब रणनीति का हिस्सा है या फिर पार्टी के भीतर अपनी पकड़ बनाए रखने की जद्दोजहद?
वहीं, विरोधी दल खासकर भाजपा के नेता इस स्थिति पर लगातार तंज कसते रहे हैं। कई बार खुले मंचों से उन्हें राजनीति से संन्यास लेने की सलाह दी जा चुकी है। यहां तक कहा गया कि अब उन्हें “भगवान का नाम लेकर शांति से घर बैठना चाहिए।” लेकिन हरीश रावत के तेवर कुछ और ही कहानी बयां करते हैं—जहां संन्यास और सक्रियता के बीच की रेखा बार-बार धुंधली होती नजर आती है।
राजनीतिक के जानकारों मानना है कि इस तरह के बयान और अचानक लिए गए फैसले पार्टी के अंदर असंतुलन का संकेत भी हो सकते हैं। खासकर तब, जब एक वरिष्ठ नेता को अपनी बात मनवाने के लिए सार्वजनिक मंचों का सहारा लेना पड़े।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह “15 दिन की छुट्टी” वाकई आराम और आत्ममंथन के लिए है, या फिर यह भी एक नई राजनीतिक चाल है, जिससे पार्टी नेतृत्व पर दबाव बनाया जा सके? क्योंकि हरीश रावत के राजनीतिक सफर को देखते हुए इतना तो तय है कि उनके हर कदम के पीछे कोई न कोई संदेश जरूर छिपा होता है।
फिलहाल, इतना जरूर कहा जा सकता है कि उत्तराखंड की राजनीति में हरीश रावत एक ऐसे किरदार बन चुके हैं, जिनके बयान खुद खबर बन जाते हैं। और शायद यही वजह है कि “संन्यास” और “सक्रियता” के बीच झूलती उनकी राजनीति लगातार सुर्खियों में बनी रहती है—चाहे वह 15 दिन की छुट्टी ही क्यों न हो।