आशीर्वाद मोदी–शाह का, फिर भी धामी क्यों खटक रहे?

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देहरादून/ऊधमसिंह नगर।
उत्तराखंड की सियासत में एक बार फिर उबाल साफ नजर आने लगा है। इस बार मामला गदरपुर विधायक और पूर्व कैबिनेट मंत्री अरविंद पांडे से जुड़ा है, जहां उनके आवास पर प्रशासनिक कार्रवाई यानी ‘पीला पंजा’ चलाए जाने की तैयारी की चर्चाओं ने राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। इस पूरे घटनाक्रम ने न सिर्फ प्रशासनिक फैसलों पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि भाजपा की अंदरूनी कलह को भी खुलकर सड़क पर ला दिया है।
सूत्रों के मुताबिक, अरविंद पांडे के आवास को लेकर चल रही कार्रवाई की संभावनाओं के बीच भाजपा के कई वरिष्ठ नेता एकजुट होते नजर आ रहे हैं। यह एकजुटता सिर्फ पांडे के समर्थन तक सीमित नहीं मानी जा रही, बल्कि इसके राजनीतिक मायने कहीं ज्यादा गहरे बताए जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि आज अरविंद पांडे के आवास पर पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत, गढ़वाल सांसद अनिल बलूनी और हरिद्वार से विधायक व पूर्व प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक के पहुंचने की संभावना है। यदि ऐसा होता है, तो यह साफ संकेत होगा कि भाजपा की ‘घर की लड़ाई’ अब बंद कमरों से निकलकर खुले मंच और सड़कों तक आ चुकी है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अरविंद पांडे लंबे समय से अपनी बगावती शैली और तीखे बयानों को लेकर चर्चा में रहे हैं। कई मौकों पर उन्होंने सरकार और संगठन के कुछ फैसलों पर असहमति जताई है। अब उनके खिलाफ संभावित प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर जो माहौल बन रहा है, उसने भाजपा के भीतर असंतुष्ट खेमे को एक मंच पर लाने का काम किया है। यही वह खेमा बताया जा रहा है, जो मौजूदा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को लेकर समय-समय पर असहजता और असंतोष जाहिर करता रहा है।
हालांकि, दूसरी तरफ यह भी एक हकीकत है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भाजपा हाईकमान की पहली पसंद बने हुए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह का भरोसा और आशीर्वाद बार-बार धामी को मिलता रहा है। केंद्रीय नेतृत्व के स्तर पर धामी सरकार के कामकाज की सराहना भी होती रही है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब हाईकमान का स्पष्ट समर्थन मुख्यमंत्री को प्राप्त है, तो फिर पार्टी के भीतर ही कुछ नेताओं को धामी की कुर्सी क्यों रास नहीं आ रही।
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि भाजपा के भीतर नेतृत्व और प्रभाव को लेकर एक खींचतान लंबे समय से चल रही है। कुछ वरिष्ठ नेताओं को लगता है कि संगठन और सरकार में उनकी भूमिका पहले जैसी नहीं रह गई है। वहीं, धामी के नेतृत्व में उभरती नई टीम और फैसलों ने पुराने समीकरणों को बदल दिया है। इसी असंतोष का परिणाम माना जा रहा है कि हर ऐसे मौके पर, जहां सरकार या मुख्यमंत्री पर अप्रत्यक्ष दबाव बनाया जा सके, वही नेता सक्रिय नजर आते हैं।
अरविंद पांडे का मामला इसी कड़ी का ताजा उदाहरण बताया जा रहा है। उनके आवास पर संभावित कार्रवाई को लेकर जिस तरह से भाजपा के बड़े चेहरे उनके समर्थन में सामने आ रहे हैं, उससे यह संदेश देने की कोशिश भी मानी जा रही है कि पार्टी के भीतर एक बड़ा वर्ग सरकार के कुछ फैसलों से सहमत नहीं है। हालांकि, यह भी सच है कि पार्टी नेतृत्व के स्तर पर अब तक इस पूरे मामले पर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।
कुल मिलाकर, गदरपुर विधायक अरविंद पांडे से जुड़ा यह मामला केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई तक सीमित नहीं दिख रहा, बल्कि यह भाजपा की अंदरूनी राजनीति, नेतृत्व को लेकर चल रही खींचतान और भविष्य की सियासी दिशा का संकेत भी दे रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह टकराव सिर्फ बयानबाजी और मुलाकातों तक सीमित रहता है या फिर इसका असर सरकार और संगठन की कार्यशैली पर भी साफ तौर पर दिखाई देता है।